अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस के उपलक्ष्य में...
शीर्षक : भूल-भूलैया!
 
बूढे बापू की बूढ़ी चमड़ी सी, सूखी धरती फटी-फटी!
तरस रही छुपाने बरसों से, दिल की परतें कटी-कटी!
 
दूरियाँ हैसियत में जुदा-जुदा, झोपड़ियाँ हैं सटी-सटी!
आग उगलती बंजर धरा पर, बूढ़ी माई डटी-डटी!
 
दूर-दूर तक आग उगलती रेत, मृगजल भूल-भुलैया हैं!
बूँद-बूँद पानी को तरसे, केर-बोरलि डाल गलबहियाँ हैं! 
 
छुपी-छुपी हैं कारी बदरिया, मोर काहे न बोले है?
सुनी-सुनी भैरुजी की पोर, सूना बाबुल का अंगना है!
 
छम-छम पायल करे घायल, तपती रेत राज खोले हैं!
जर्जर महल-मेरियों में अब तो, भूत-पिशाच का डेरा हैं!
 
बुढ़ा खांसे रात-रात भर, बीड़ी बुढ़ापे का सहारा है!
चम-चम चमके आंखों में आंसू,आईना बहुत पुराना हैं!
 
बरगद-पीपल की ठंडी छांव, न दे सुकून, दे ताप-संताप !
जवाँ औलाद की याद में, झूर-झूर मरे, बुढे मायर -बाप!
 
खाली मटकी, खाली जेब, कैसे दे दिल को ठंडक ढाक?
मिट्टी की सौंधी खुशबू में घुले जब चूल्हे की बुझी-बुझी राख!
 
बिजली, पानी की लुका-छुपी, स्वास्थ्य सेवाओं का अकाल!
खेतों में भले मुस्क़ुराएं सूरजमुखी, अन्नदाता का है बुरा हाल!
 
सावन के झूले कहां? पेड़ों पर हैं फांसी के फंदों का जाल!
पथरीली पगदंडी पर मानो चल रहा जीता-जागता कंकाल!
 
खेत-खलिहान, ताल-तलैया, नीम-बरगद, मोर-पपीहे का गाँव !
ढूंढ़ रही हूँ मानस पटल पर रचा-बसा पुरखों का जिन्दा गाँव !
 
वीरों की उर्वरा धरती ,जौहर से प्रज्वलित अग्निशिखा सा गाँव !
मानवता का ध्वज लहराता, पशुधन से भरा-पूरा मेरा गाँव!
 
लक्ष्मण-रेखा लांघ कर, आओ चले पुरखों के गाँव की और!
क्षितिज रेखा पार कर, देखे सुजलाम, सुफलाम गाँव की भोर!
इस पर लोग क्या कह रहे हैं