दोहे....
कठिन डगर हैं प्रेम की, काँटों की हैं राह|
मधुर मिलन की चाह हैं, भूल जगत का दाह||
 
कठिन सदा हैं जीतना, चोटी पर स्थिर वास,
हार-जीत में झूलते, अविचल रखना आस!
 
मोर-मोरनी बाग में, नाचे जग को भूल |
डोले बागों में कुसुम, उड़े हवा से धूल ||
 
संविधान माँ भारती,  सर्वश्रेष्ठ हैं ताज |
राष्ट्र अस्मिता से बड़ा, नहीं नया हैं साज ||
 
बन जोगण मीरा फिरे, सरल ह्रदय में भाव |
विधि-विधान में हैं लिखा, गिरधर संग लगाव ||
 
सब विधान लिख देवता, चले स्वर्ग की ऒर|
कब क्या होगा हैं नियत, हाथ प्रभु के डोर!
 
सब विधान लिख देवता, चले स्वर्ग की ऒर|
कब क्या होगा हैं नियत, रात बाद हैं भोर! 
 
मीठे लागे राम को, शबरी के वह बोर |
सरल ह्रदय शबरी कहे, राम चरण मम ठोर!
 
विधि-विधान से लो सदा, महावीर का नाम |
वर्धमान गुणगान से, होवे सारे काम!
 
प्रकृति के पल्लू तले, पाती धरा दुलार |
नदियाँ करती शोर रे, लहरें देत हुलार||
 
कुसुम अशोक सुराणा
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