तर्ज:केवट ने कहा रघुराई से
प्रभु पार्श्व तुम्हारे चरणों में
तेरा भक्त शीश झुकाता है
तू कर लेना उद्धार मेरा
मेरा तुमसे पुराना नाता है
प्रभु पार्श्व तुम्हारे.......
देदो दर्शन प्रभु तुम मुझको
दो ज्ञान तुने जो पाया है
हमको भी बता दो राह वही
फल मुक्तक जहाॅं से लाया है
प्रभु पार्श्व तुम्हारे.......
यह जग रहा नहीं रहने जैसा
इसका मुझको अहसास हुआ
छल प्रपंच हैं सभी खेल सारे
व्यर्थ वास ये प्रवास हुआ
प्रभु पार्श्व तुम्हारे.......
उलझन में उलझा अनसुलझा
यह आतम अब मुक्ति चाहे
लिप्त हुआ व्यर्थ की बातों में
समाधान एक सुक्ति चाहे
प्रभु पार्श्व तुम्हारे.......
स्वरचित: अशोक दोशी