शीर्षक : उम्र की ढलान पर...
खुद को देख आईने में,
खुद ही संभल जाते है!
झुर्रियाँ शुष्क चेहरे की देख ,
वक़्त का मिज़ाज जान जाते हैं …
उम्र की ढलान पर रिश्ते,
टूटे शीशे से चुभते हैं ....
चोट सीने पे लगी सही, …
ऊफ़ भी न कर पाते हैं !
वंशवेल की हरियाली ....
पतझड़ में दम तोड़ती है ....
जीर्ण रिश्तों की नमी ....
दरारों में उभरती है !
वक़्त के गुलाम हम,
हर चोट पर मुस्कुराते हैं …
हकीकत के धरातल पर,
टूटे शीशे से बिखर जाते हैं!
जिंदगी ही तो नाम है,
अटूट जिजीविषा, संघर्ष का !
साथी अपने रहे या ना रहे ....
अस्तित्व के अभिशाप का!!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |