खो रही मानवता की पहचान अबइंसानियत पहचाने न इंसान अब
सुनना तुम बस बोलना कुछ भी नहीं
है सियासत का यही फरमान अब
बस चुनावों में तुम्हें पहचानेंगे
कर दिया है कुर्सी ने ऐलान अब
चैन और राहत के पल मिलते नहीं
हर कोई है लग रहा परेशान अब
प्रेम की कीमत नहीं अब दुनिया में
नफरतों पर दे रहे सब ध्यान अब
आंधियों से बच के तो हम आए थे
कर रहा पीछा मगर तूफान अब
कार की कीमत बढी़ हर दिन यहां
संस्कारों से हुए अंजान अब
बोलबाला लोभ-लालच का हुआ
बिक रहे खुलेआम हैं ईमान अब
तेल- राशन हो गए महंगे यहां
हो गई सस्ती है लेकिन जान अब
जिंदगी लगने लगी मुश्किल मगर
लग रहा मरना यहां आसान अब