भाग ८६
लाली की तबियत में अब कुछ-कुछ सुधार नज़र आ रहा था। दगड़ा बाई का कलेजा मुँह में आ गया था परसो अपनी एकलौती बेटी का हाल देख कर। आखिर इतना ज़िन्दगी से संघर्ष किस लिए था? अपनी बेटी का भविष्य उज्जवल हो इसलिए ही तो था यह संघर्ष!
लाली को मुस्कुराते देख दगड़ा बाई संभल गई थी। अब लाली भी उसे थोडी-थोडी काम में मदद करने लगी थी। पद्मावती जी भी सच जानती नहीं थी उन्हें लगा कि दो-चार दिन बाद वह फिर मुम्बई चली जाएगी लेकिन जब पांच-छ: दिन बाद भी लाली नहीं गई तो उन्हें विभा की चिंता होने लगी। वो खामोश कैसे रहती? उन्होंने अप्पा को पूछा तो उन्होंने कहा कि विभा के साथ मुम्बई की ही एक लड़की को काम पर रख्खा हैं ताकि आने-जाने की यह झंझट न रहें।
विभा का दिन तो आराम से निकल जाता लेकिन रात बहुत भारी-भारी लगती। मन में विचारों के बवंडर कोहराम मचाते और उसकी नींद चुरा ले जाते।
जैसे ही पढाई के वक़्त लाइब्रेरी में उसने अपनी समस्या वज्र-वैदेही को बताई, तो वज्र ने कहा, "अन्नपूर्णा की मामा की लड़की यहीं मुम्बई में रहती हैं। उसका और कोई नहीं हैं। मैं उससे बात करता हूँ" विभा को थोड़ी राहत महसूस हुई। उसने अप्पा को भी यह बात बताई और अप्पा ने भी उसे अनुमति दे दी।
अन्नपूर्णा की बात सुनकर उसकी बहन बहुत खुश हुई। उसे काम की सख्त जरुरत थी। जहाँ रहती थी वहाँ का कमरे का भाड़ा देना भी उसके लिए मुश्किल था। वह दूसरे ही दिन विभा को मिलने पहुँच गई। अप्पा भी आएं हुए थे। उसकी बातों से तो वह सरल और जरूरतमंद लग रही थी। उसने चौबीस घंटा साथ रहने की बात स्वीकार की क्योंकि उसका आगे-पीछे कोई परिवार था ही नहीं। एक हादसे ने उसका पूरा परिवार निगल लिया था।
अप्पा ने उसका 'पुलिस वेरिफिकेशन' कराया और उसे काम पर रख दिया। उसे खाना-पीना-रहना मुफ़्त और ऊपर से पांच हज़ार रूपएँ खर्चे के लिए देना निश्चित हुआ। शर्त एक ही... दिन-रात विभा के साथ रहना और काम को पूरी ईमानदारी तथा सुचिता से करना। उसका नाम था गौरी! जैसा नाम था वैसी ही दिखने में आकर्षक और साफ-सुथरी थी वह! आई तब पैबंद लगी साड़ी पहनी थी लेकिन पहनी थी करीने से। चेहरे पर भरपूर आत्मविश्वास और विनय। अप्पा के बार-बार कहने पर भी वह बैठी नहीं, दीवार के पास ही खड़ी रही।
अप्पा ने ड्राइवर को साथ भेज उसका सामान यहाँ मंगवाया और वह विभा के साथ रहने लगी। अच्छे घर की एक लड़की वक़्त के हाथों मजबूर हो चुकी थी। सातवीं तक वह पढ़ी भी थी। उसका काम करने का तरीका देख महसूस होता था कि वह एक संस्कारी घर की लड़की हैं। विभा उससे खुश थी। कभी-कभार वह खुद ही उसकी बात अन्नपूर्णा तथा महेश यानि की छोटू से करवाती। दोनों से बात कर वह बहुत आनंदित होती।
अप्पा के सिर से अब विभा की चिंता का बोझ कुछ हद तक उतर चूका था। अब अप्पा विभा के सवाल का जबाब ढूंढ़ने की कोशिश में लग गए। बी एम सी के अधिकारियों से उनकी बात हो चुकी थी। अतिक्रमण की शिकायत उन्होंने दर्ज कर दी थी।
दो दिन बाद ही म्युन्सिपालटी का तोड़क दस्ता पुलिस बल के साथ पहुँच चूका था। जितनी भी अवैध दुकाने थी वो जमींदोस्त हो चुकी थी। उनको बनाने में लगा सामान, माल सब कुछ तोड़क दस्ता अपने साथ ले गया था। घर के सामने अब न टपरी थी न छोटे ठेले। पूरा इलाका साफ़ कर दिया गया था।
आज विभा के दिल को कुछ सुकून मिला था। उनकी बददुआओं का कुछ तो असर हुआ था। जितनी भी दुकाने तोड़ी गई थी सब की सब सरकारी जमीन का अतिक्रमण कर बनाई गई थी। विभा मन ही मन सोच रही थी, " न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी"
यश के लखनऊ अकादमी में जाने के बाद वह पढ़ाई में मन लगा रही थी लेकिन यश की उसे इतनी आदत पड गई थी कि उसका ताना, चुटकुला सुने बिना विभा को चैन ही नहीं पड़ता था। वैदेही और वज्र उसे पूरा सहयोग दे रहे थे। वीणा तो थी ही उसका मनोरंजन करने के लिए। जब भी बोलती, ऐसा बोलती कि हँसी के फव्वारे छूट पड़ते। जैसे-जैसे वीणा और विभा के रिश्ते में खुलापन आने लगा उनके बिच का संवाद बेहतर होने लगा। वो एक-दूसरे को समझने लगी। अब वीणा और उसका खेल में तालमेल बेहतर हो गया था। नितीन सर भी उनके सुधार के प्रयास से खुश थे। अब उन्हें उम्मीद थी कि महिला युगल स्पर्धा में में भी दोनों कुछ कमाल दिखा पायेगी।
विभा के दिल को अब थोडी राहत मिल चुकी थी। इस दुनिया में ऊपरवाले से बड़ा न्याय का देवता कोई
नहीं। अपराधी का अहंकार भी वहीं बढाता हैं और अंत में ऐसी गलती करवाता हैं कि फिर कितना भी हाथ-पैर मारें, उसे कोई बचा नई सकता। उपरवाले के यहाँ देर हैं पर अंधेर नहीं। उसकी लाठी की मार देर-सवेर ऐसी पडती हैं कि वह अपने किए की सजा भुगतता ही हैं।
उपरवाले का न्याय देख कर विभा का विश्वास ईश्वर पर और मजबूत हो गया था। उसने यश को फ़ोन किया। उसका कुशलक्षेम पूछा और दिल की बातें कर वह चैन से सोने की तैयारी करने लगी। नींद तो कब की छू-मंतर हो चुकी थी। उसने मुंशी प्रेमचंद की किताब को टटोला। समाज की विषमताओं का चित्रण पढ़ कर उसका मन और भी उद्विग्न हो रहा था। उसने मोबाइल पर अपनी 'प्ले लिस्ट' खोल गाने सुनने शुरु किएं। चान्दनी रात, तारों की बारात, बहती हवाओं की शहनाई सुन निंदिया रानी भी मुस्कुराने लगी और विभा कब नींद के आगोश में सो गई पता ही नहीं चला।
गौरी हौले से पानी की बोतल रख कर, मोबाइल बन्द कर बाहर दिवानखाने में आई और अपना बिस्तर लगा सो गई। रातरानी की सुगन्ध दूर कहीं से आ रही थी और मन मोह रही थी..
तभी मोबाइल की घंटी बजने लगी। अप्पा का फ़ोन था।
गौरी ने फ़ोन उठाया और कहा कि दीदी सोई हुई हैं। उसे जगाऊं या मेसेज दूँ? अप्पा ने पूछा, " गौरी! दीदी की तबीयत तो ठीक हैं न? आज दस बजे ही सो गई। क्या बात हैं? "
"अप्पा! दीदी की तबियत तो ठीक हैं लेकिन आज बहुत दिनों बाद वह आराम से सोई। वो क्या हैं न.. सारा दिन यहाँ तोड़क दस्ते की कारवाई हुई न! सारी अवैध दुकाने, फूलवाले की टपरी, नारियल वाले की दुकान सब तोड़ डाली उन्होंने ! सारा दिन यहाँ शोर ही शोर था तो दीदी दोपहर में आराम नहीं कर पाई। अब उन्हें तो गहरी नींद आई हैं! आप कहों तो जगाऊं! नहीं तो सुबह फ़ोन करने को कहती हूँ। ठीक हैं न अप्पा ?"
उसकी मीठी बोली सुन अप्पा बहुत प्रसन्न हुए। बोले, " सुबह फ़ोन करने को बोल देना। अब तुम भी सो जाओ!" और आबा ने फ़ोन रख दिया। अप्पा को पता था आज विभा को चैन की नींद क्यों आई हैं! वो नई सुबह का इंतज़ार करने लगे....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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