बचपन की उलझनें....

फुरसत के पलो में मैं कबीर का दोहा पढ़ रही थी..

 "गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागु पाय..

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय"

मैं आत्मनिरीक्षण क़र रही थी ...भाग्यवान थे हम जो हमें ऐसे गुरु मिले जिन्होंने हमें किसी मूर्तिकार की तरह छैनी से ठोंक-ठाक कर एक बेहतरीन शिल्प....इन्सान बनाया..स्वाभिमान से जीने की कला सिखाई..वक्त के थपेड़े को सहने की ताकत पैदा की...श्रम का महत्व समझाया और हमारी जीने की राह आसान बना दी...मैं भूतकाल में गोते लगा रही थी..

तभी टीवी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ आई ...."नौवी कक्षा के बच्चे ने स्कूल में शिक्षक की हत्या की... "

मैं सुन्न हो गई ...दिल बरबस कराह उठा... .आज न वैसे शिष्य हैं न वैसे गुरु!

वक्त के साथ-साथ शिक्षा के मायने बदल गए हैं ..गुरुकुल की परंपरा पुरानी हो चली हैं ...प्रान्तीय भाषा में शिक्षा की जगह अंग्रेजी ने हथिया ली है..बस्तों का बोझ, होम वर्क का टेंशन, प्रोजेक्ट वर्क, ढेर सारी किताबें...स्कूल के बाद भोजन गले में जैसे-तैसे ठूंस दिया और चल पड़े ट्युशन  क्लासेस की ओर...घर में आते ही टीवी, वीडियो गेम, मोबाइल !! बच्चों के दायरे सिकुड़ गए हैं ...न दोस्तों से गपशप, न सहपाठियों के साथ कोई मैदानी खेल, न किसी से मिलाना न किसी बुजुर्ग से दो चार बाते करना...!! बस.. पढाई .. पढाई..पढाई..

इम्तिहान ही बच्चे की क्षमता, प्रतिभा आंकने का साधन बन रहा है.. इम्तिहान के वक्त आत्महत्या, अवसाद, परीक्षा फोबिया के शिकार हो रहे बच्चे इस घुटन भरे माहौल से छुटकारा पाना चाहते हैं ..ऐसे में अगर कोई बच्चा शिक्षा से तौबा कर ले, या डांटने वाली अपनी शिक्षिका से इतनी नफरत करने लगे कि वह उसकी जान तक लेने पर अमादा हो जाये, तो आश्चर्य नहीं होगा!! आखिर हम क्यों बचपन छिनने पर उतारू है? जो उम्र खुले असमान में स्वछंद उडान भरने की होती है... कल-कल बहते झरनों से बातें करने की होती है..पहाड़ो की चोटियाँ गर्दन ऊँची क़र नापने की होती है, उस उम्र में उनपर इतना जुल्म क्यों? 

पैसे के पीछे भागते माता-पिता, एकल परिवार में पलता बच्चा, प्यार के आंचल की नमी को तरसता बच्चा,  जब घंटो टीवी, वीडियो गेम, मोबाइल गेम खेलते रहेगा..न खाने की सुध-बुध, न पढ़ने की चाहत..ऐसे माहौल ये नन्हे पौधे सूखेंगे नहीं क्या क्या कैसे? कैसे उनपर रंगबिरंगी फूल खिलेंगे जो उनके और आपके सपनों में रंग भर सके?...

शिक्षक सौ-सौ बच्चों को एक साथ पढ़ायेगा तो क्या ध्यान रख पायेगा बच्चे के बौधिक और सर्वांगींण विकास का...देश का भविष्य बनाने वाले ही जब अपनी बकाया पगार के लिए हड़ताल करने के लिए मजबूर होंगे या फिर ट्युशन में ध्यान देंगे तो वह कैसे बच्चे से जुड़ पाएंगे? क्या वे बच्चे से रिश्ता बना पाएंगे? अभिभावक भी न तो शिक्षक को गुरु का दर्जा देते है न अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करना सिखाते हैं ..फिर भटके हुए बच्चे को किसका सहारा?..वो बिना पतवार की कश्ती की तरह भटकेगा ही न!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

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