शीर्षक : मुँह-दिखाई!
मधुचन्द्रमा की रात में,
चाँद खेले आँख-मिचौली!
सावन की बरसात में,
भीगी निशा की तंग चोली!
नववधु सी सिमटी-सिमटी,
प्रियवर बाहुपाश में लिपटी!
अधरों पर झुके गुलाबी अधर,
दो-दो गुलाब खिले डाल पर!
सुहागरात की मुँह-दिखाई,
पिया ने पकड़ी गोरी कलाई!
कुन्दन जड़ित सुवर्ण कंगन!
चुड़ा-चुनर श्रुँगार सुहागन!
मन्द-मन्द पवन के झोंके,
यौवन-अगन कैसे कोई रोकें?
रति-मदन की काम-क्रीड़ा,
जल-तरंगों की सुर-ताल-क्रीड़ा!
मन्त्रमुग्ध हुई चंचल पायल,
नयन-कटार से शोडषि घायल!
तेज हुई जलतरंग सी धड़कन,
खामोश हुए हाथों के कंगन!
प्रीतम-आगोश में रूपसी नि:शब्द,
भूली-बिसरी प्रतिकार के शब्द!
एक-दूजे में समाएं दूध-मिश्री से,
जलधि को समर्पित अर्ध्य से!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!