भाग २
आज यश का ऑपरेशन था! सभी जानते थे कि मुम्बई के इस सरकारी हॉस्पिटल में तमाम सुविधाएं, संसाधन और मशीनरी होने के बावजूद भी महीनों-महीनों तक मरीजों की बारी नहीं आती हालांकि यह सरकारी व्यवस्थापन में संचालित, नई तकनीक से सुसज्जित, आधुनिक मशीनरी तथा ज्ञान से लैस, नामी-गिरामी चिकित्सकों की सेवाओं से परिपूर्ण सिर्फ महाराष्ट्र का ही नहीं, सम्पूर्ण देश का उत्कृष्ट अस्पताल हैं, भाई-भतीजावाद,शिफ़ारिशें, भेद भाव से दूर...मगर क्या करें....मरीजों की भीड़ ही इतनी होती हैं....
कई मेघावी छात्र यहाँ से पढ़कर विश्व-सेवा के लिए समर्पित हो, कृत-संकल्प हो निकलते हैं... कुछ मानवता की सेवा के लिए... कुछ बेहतर जीवन-शैली के लिए। मगर कहाँ जाएँ वो मरीज जिन्हें आज... आज इलाज की जरुरत हैं... जो ज़िन्दगी-मौत के बिच झूल रहें हैं? जिनके ऊपर लक्ष्मी जी कृपादृष्टी नहीं हैं?
यश के माता-पिता सालों पहले राजस्थान से यहाँ आ कर बसे थे... पुरखों की धरती थी राजस्थान! जयपुर में उनकी पुश्तेनी हवेली थी।
आज भी वह हवेली अपनी विरासत और वैभव की कहानी कहती हैं। रेगिस्तान में अपना अस्तित्व उन्होंने बनायें रक्खा था अपनी अनोखी पहचान के साथ! जयपुर में उनका ऑफिस भी था... व्यापार मूल्यवान पत्थरों का था जो की देश-विदेश में फैला हुआ था..पिता का देश-विदेश में आना-जाना लगा ही रहता था! मुम्बई में वे अपना रजिस्टर्ड ऑफिस बनाना चाहते थे और उसे बेटे को सँभालने के लिए देना चाहते थे...'जयपुर फुट' के बारे में उन्होंने पहले से सुना था, उस संस्था को उन्होंने अच्छा-खासा डोनेशन भी दिया था मगर उन्हें कहाँ पता था कि एक दिन उन्हें 'जयपुर फुट' जरुरत पड़ेगी... किस्मत का खेल ही निराला था। किस्मत न जाने क्या-क्या कहर ढाने वाली थी इन युवाओं पर..वक़्त के गर्भ में न जानें क्या-क्या छुपा था अनसुलझी पहेली की तरह! यश के पिताजी ने ऑपरेशन के लिए यश को जयपुर ले जाने का फैसला कर दिया था। उनकी जयपुर के लिए फ्लाइट की टिकिटे आ चुकी थी...
वैदेही यश से मिलना चाहती थी लेकिन डॉक्टर ने उसे वार्ड से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी थी। बाहर जाने का मतलब इन्फेक्शन को नौता देना था और इसकी अनुमति कैसे दी जा सकती थी? इतने दिनों की कठिन तपस्या पर पानी फेरना कहाँ तक उचित था? वक़्त के एक बवंडर ने उनकी सपनों की दुनिया को तितर-बितर कर कर रख दिया था। उसे रच्चनहारे पर बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन असहाय, लाचार थी वह। आखिर जमीं जमाई बाजी को एक आँधी से तीतर बितर कर रच्चणहारे को क्या मज़ा आता हैं? क्यों वह हमारी बर्बादी पर मुस्कुराता हैं?
वैदेही खामोश हो कर छत की ऒर देखने लगी! आज उसका मन बिल्कुल नहीं लग रहा था! दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी! विभा की कोई खबर नहीं मिली थी उसे... यहीं अस्पताल की नई बिल्डिंग में एडमिट है इतना ही पता था उसे। तभी सिस्टर ने माँ को बाहर बुलाया... शायद कोई उसे मिलने आएं थे! माँ उसके बालों में उंगलियाँ घुमा कर उसे आश्वस्त कर बाहर चली गई...
वैदेही फिर यादों के बवंडर में तेज रफ़्तार से अपने ही इर्दगिर्द गोलाकार चक्कर लगाने लगी.. असहाय सी..अनमनी सी..
ऊपरवाले पर उसे बहुत गुस्सा आ रहा था! इतनी प्यारी दोस्तों की टोली थी हमारी...सब मिलकर कहीं किसी चौराहे पर ज्वलंत विषय को आधार बना कर एकांकीका प्रस्तुति करते...सामाजिक कुरीतियों, काल-बाह्य परंपराओं पर प्रहार करते.. रात-दिन एक कर मेहनत करते.. नाटक का मंचन करने के लिए... ज़िन्दगी को करीब से देखने-समझने का प्रयास करते... क्या गुनाह किया था प्रभु हमने? क्यों.. क्यों...सब कुछ तहस-नहस कर दिया प्रभु आपने...?
तभी माँ की आहट से वह सचेत हो गई.. क्या बात हैं? कौन मिलने आया था माँ को... इतनी उदास क्यों हो गई माँ? असंख्य सवालों ने मन में तूफान मचा रक्खा था..पर सब के सब अनुत्तरित।
माँ के हाथ में थर्मास देख वैदेही अतीत को टटोलने लगी.. ऐसा थर्मास तो विभा लेकर आती थी.. कहीं विभा के माँ- बाबूजी तो नहीं आएं थे मिलने...अप्पा यानि कि यशवंत राव जहागीरदार तो कराड रहते हैं .. सिर्फ विभा यहाँ होस्टल में रहती थी। यादों के परिंदे थक कर विशाल पीपल के पेड़ पर विश्राम करने लगे...
विभा! मेघावी छात्रा... जमीन से जुडी, लक्ष्मी की मेहर.. लेकिन लक्ष्मी का दम्भ नहीं...उसके पिताजी सहकारी शुगर फैक्ट्री के ट्रस्टी जो ठहरे! घर में गाड़ी-घोड़ा, नौकर-चाकर..सब कुछ था मगर इस पगली पर स्व-बल पर सब कुछ हासिल करने का भूत सवार था। चली आई थी मुम्बई....अपनी शर्तों पर जीने के लिए। बिल्कुल समंदर के सामने उसका गर्ल्स होस्टल था... समंदर की लहरों का संगीत पल-पल उसे उत्साहित करता था। कितनी नादान थी वो लहरें! बार-बार किनारे पर सिर टकराने के बावजूद भी फिर लौट आती थी उसी से गलबाहिया डालने...महाराष्ट्र सरकार द्वारा संचालित था वह होस्टल! सुदूर गाँवो से पढ़ने आई लड़कियाँ यहाँ रहती थी।
इसी बिच उसके मन में एक विचार बिजली सा कौन्ध गया..कहीं विभा अति दक्षता विभाग में तो नहीं हैं?... आशंकाओं के अनगिनत शूल मस्तिष्क में बिखरे पड़े थे। जरासा स्पर्श किया नहीं कि लगता मानों उंगलियाँ लहूलुहान हो जाएगी ...
डॉक्टर कह रही थी वह मानसिक धक्के से धीरे-धीरे उबर रही हैं मगर वैदेही को लग रहा था वह अवसाद के भंवर में और-और गर्त में खींची जा रही हैं।
उसने माँ को आखिर पूछ ही लिया.. कौन थे मम्मा...?
"कोई नहीं बेटा... वो विधायक ज़ी और दो-तीन उनके साथी, जिन्होंने तुम लोगों को यहाँ लाया था.. तुम सबको समय पर इलाज मिले इस लिए धरती-आसमान एक कर दिया था उन्होंने!
बेटा! मैंने हाथ जोड़कर उनका शुक्रिया अदा किया.. उनकी तत्परता और प्रयासों से ही तुम्हारी और तुम्हारे सभी दोस्तों की जान बची..आज अगर मैं तुमसे बात कर पा रही हूं तो इसका सब से ज्यादा श्रेय इन अनजान लोगों को जाता हैं! इन्होने मानवता की कितनी सुन्दर मिसाल पेश की! "
अचानक वैदेही को विनय की याद आ गई... वह दर्द से कराहती हुई बोल पड़ी..
"माँ.. विनय के परिवार वाले आएं नेपाल से? अभी कौन देख रहा हैं उसे? माँ... बच जायेगा न वह ? अभी भी वेंटीलेटर पर हैं वो माँ?
कितने सवाल... एक साथ.. चौके पे चौका जड़ी जा रही हो... कोई हैं नहीं वहाँ बॉल को लौटाने के लिए... सवालों का जबाब देने के लिए।
"बेटा! बस कर....बेटा! बस कर....थोड़ा आराम कर ले ... जो उलझन हम नहीं सुलझा सकते उसे भगवान पर छोड़ देना ही अच्छा हैं बेटा " माँ ने छुप कर पल्लू से आँखें पोछी और वह झट से बाहर चली गई..उसके पास न तो किसी सवाल का जवाब था न समाधान! यह तो वैदेही की हालत थी! क्या होगी उन माँ बाप की हसलत जिनका लाडला यहाँ भविष्य को संवारने आया था और भूतकाल उसे निगलने को अजगर सा मुँह फाडे इंतज़ार कर रहा था।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
शेष भाग अगले अंक में....