कुण्डलिया छन्द।
विषय : पिता
हथियारों की होड़ में, मूल्य गए हैं हार।
महाशक्तियाँ युद्ध में, करती जमकर वार।।
करती जमकर वार, डाल कर घी नफ़रत का।
सुलगाती है द्वेष, मोड़ कर रुख़ दरख़्त का।।
भाईचारा खत्म, दहक हैं अंगारों की।
दारुण मंजर भूल, खेप दे हथियारों की।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई