दूरियाँ दिलों को अक्सर जोड़ती हैं यारों।सागर में समाने सरिता दौड़ती हैं प्यारों।
ब्याहता राणा की चली,
राज महल की ऒर।
रुण झुण बजे पायलड़ी,
गिरधर से बँधी डोर।।
दूरियाँ अवचेतन मन को लाँघती हैं यारों।
सागर में समाने सरिता दौड़ती हैं प्यारों।
राणा की परिणिता मीरा,
खेले कान्हा संग होली।
रिश्ते-नाते भूल जगत से,
मीरा मोहन की हो ली।।
दूरियाँ अलौकिक प्रेम में बाधा नहीं यारों।
सागर में समाने सरिता दौड़ती हैं प्यारों।
गिरधर दीवानी मीरा,
भटक रही कानन-कानन।
लोक-लाज भूल बावरी,
छोड़ चली महल-आँगन।।
दूरियाँ अनुरागी दिलों को जोड़ती है यारों।
सागर में समाने सरिता दौड़ती हैं प्यारों।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
*(चित्र कलाकार राजन धनराज जी के सौजन्य से)*