भाग ८५
आजी की बातें जानकी जी के मन में तांडव कर रही थी। 'पोरी चं लग्न कधी करतेस? काखेला कळसा अन गावाला वळसा?' सामान्य परिस्थिति में वज्र का रिश्ता आता तो क्या जानकी जी इतना सोचती? लेकिन अब.. हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद?
जानकी जी के मन में जबरदस्त द्वन्द चल रहा था! वह रस्सी पर चल कर अपना संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी। एक तरफ वैदेही के भविष्य की चिंता तो दूसरी तरफ आजी की बातें! यह तो वह भी जानती थी कि वैदेही के मन में वज्र के प्रति असीम प्यार है! होगा भी क्यों नहीं? दोनों ने हर वक़्त एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर ही जीवन की वैतरनी पार की हैं .. तो फिर अब चिंता क्यों? दूसरा मन कहता, तब हालत और थे, अब और! हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद क्या भरोसा उसके जीवन का? तभी दूसरा मन बोल पड़ता, " जब तुमने श्री से शादी की तब तुम्हें पता था न कि श्री रोज मौत से मुलाक़ात कर लौटता है! उसकी ज़िन्दगी का रत्तीभर भी भरोसा नहीं! कब किस नक्सलवादी की गोली का शिकार बन जाये, कब कोई लैंड माईन उसके परखच्चे उड़ा दे! फिर भी तुमने शादी की थी न सब से बगावत कर ?
जानकी जी परेशान हो कर चिल्ला पड़ी.. हाँ.. की थी मैंने श्री से शादी! प्यार करती थी मैं उसे! दिलोंजान से चाहती थी उसे!"
"फिर वैदेही के लिए क्या समस्या है? ज़िन्दगी छोटी हो या बड़ी! चैन से, सुकून से गुजरे तो समस्या क्या है?" उसके मन ने फिर सवाल दागा।
जानकी जी अस्वस्थ हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कहीं सोच-सोच कर दिमाग़ की नसें न फट जाएं!
वह श्री के फोटो के सामने खड़ी हो गई। श्री भी उसे कभी निराश नहीं करता! हौले से उसके गालों को थपथपा कर बोल पड़ा! पगली! वैदेही पर छोड़ दे इसका निर्णय! तूँ क्यों उसकी चिंता में आधी हो रही है? मैं हूँ न मेरी जान!
जानकी जी देर तक श्री की फोटो निहारती रही। उसने फोटो पर लगा चन्दन का हार निकाला। धूल-मिट्टी साफ़ कर उसे फिर से श्री के फोटो पर लगाया। घी का दीपक जलाया और मोगरे की सुगन्ध वाली अगरबत्ती जला कर वह हाथ जोड़ कर रसोई की ऒर बढ़ गई। मन ही मन वह कह रही थी, "श्री है न मेरे साथ! क्यों घबराती हूँ मैं छोटी-छोटी चुनौतियों से?'
वैदेही सुबह-सुबह अपने लिए चाय-नाश्ता बना कर कॉलेज के लिए निकल चुकी थी। माँ को थोड़ा सुस्त देखकर उसने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। कई बार देर रात माँ को सोचते-सोचते आराम कुर्सी पर ही नींद आ जाती थी। कभी-कभार पानी पीने वह उठती तो माँ को इस तरह जागते देख दुःखी होती लेकिन क्या इलाज था उसके पास? वह माँ को शाल ओढ़ा कर उसके कमरे में ले जा कर सुलाती और खुद भी सो जाती।
शहीदों की विधवाओं का सरकार के आर्थिक सम्बल के बाद भी जीवन कितना चुनौतिपूर्ण होता है वह करीब से जानती थी। दुनिया चार दिन जय जय कार करती है फिर देखने भी नहीं आती कि इन शहीदों के परिवारों का क्या हाल हैं।
वैदेही मन ही मन आबा को साधुवाद दे रही थी कि उन्होंने कभी माँ को अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया। हर तीज-त्यौहार उनका परिवार उन्हें बुलाता, हर उत्सव में शामील करता।
जानकी जी अब कुछ-कुछ संभाल चुकी थी। वैदेही लाइब्रेरी में सब मिल कर पढ़ाई करने के बाद ही घर आने वाली थी। जब भी जानकी जी अकेली होती, उन की सखी-सहेली होती किताबें।
जानकी जी को बचपन से ही किताबों का बड़ा शौक था। उनके पिताजी उनके जन्मदिन पर हमेशा उनकी पसंद की एक किताब लाकर उन्हें उपहार स्वरुप देते। किताब के पहले ही पन्ने पर उनका रंगबिरंगी स्याही में लिखा सन्देश होता और नीचे उनके हस्ताक्षर!
आजी भी किताबें जानकी जी सीने से लगाएं रखती थी। आज न पिताजी रहे थे न माँ। भाई-भाभी ने तो उनके प्रेम विवाह का विरोध करते हुए कब से उनसे नाता तोड़ दिया था। माँ-बाबूजी थे तब तक था पीहर... पीहर की गुलाब की पंखुड़ियों सी यादें! उनके जाने बाद वह गुलाब भी सूख गया था और पंखुड़ियाँ भी बिखर चुकी थी।
लेकिन कहते हैं न कि नीली छतरीवाला एक दरवाजा बंद करता हैं तो दूसरा खोल देता हैं। बस! वहीं हुआ। आबा ने उन्हें सहारा दिया। उनकी हर वक़्त वो खैर-ख़बर लेते, उन्हें हिम्मत देते। वक़्त आने पर सब से पहले आबा और उनका परिवार आ कर खड़ा रहता उन्हें मदद करने के लिए।
प्रतिभा जी भी एक परिपक्व सोच वाली महिला थी। भले ही किताबी ज्ञान कम था लेकिन जीवन की किताब को उन्होंने बहुत करीब से पढ़ा था। वह उन महिलाओं में से नहीं थी जो अपने पति पर बेवजह शक करती, उनकी भलमानसियत पर सवाल खड़े करती। उनके दाम्पत्य जीवन की नींव अटूट विश्वास पर ही टिकी हुई थी और आबा विनायक राव जी ने भी कभी उसे जाने-अनजाने में भी चोट पहुँचाने की कोशिश नहीं की।
वैदेही को आज घर से ही काम करना था। वह कॉलेज से आकार, जल्दी-जल्दी खाना खा कर सीधे लैपटॉप के सामने बैठ गई। अब वक़्त के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ गई थी।
कल आबा की शाम छ: बजे नए विदेशी ग्राहक के साथ मीटिंग तय थी। उसने आबा और वज्र को भी इस मीटिंग के बारे में जानकारी दे दी थी। आबा आज रात तक मुम्बई पहुँचने वाले थे। वैदेही को अपना सभी डाटा तैयार रखना था। आबा के सवाल हमेशा अनपेक्षित होते थे। जैसे बच्चा अगर उपरी-ऊपरी पढ़ाई करें, पाठ्यपुस्तक को गौर से न पढ़े... तो पहले सवाल को थोड़ा घुमा-फिरा कर पूछा नहीं कि गच्चा खा जाता हैं वैसे ही सारी जानकारी अगर अपडेटेड नहीं हैं तो आबा के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो जाता था।
अपने माता-पिता की तरह ही वैदेही जिस काम को हाथ में लेती थी उसकी तह तक पहुँच जाती। उसके इसी गुण के कायल थे आबा। वह जानते थे वैदेही को जिम्मेदारी देने का मतलब निश्चिन्त हो जाना।
भाग ८५
विभा ने नए क्लाइंट की पूरी फाइल तैयार कर के रखी थी। क्लाइंट को 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' की जानकारी पहली बार कहाँ से मिली से लेकर प्रतिष्ठान के किस उत्पाद में उसे व उसकी कंपनी को रूचि हैं तक की सारी जानकारी फाइल में थी। आबा के आने से पहले उसे वह फाइल वज्र तक पहुँचानी थी।
रात के आठ बजने को थे और आबा का फ़ोन आया। जानकी जी ने फ़ोन उठाया। आबा ने दोनों माँ-बेटी को घर पर बुलाया था और वैदेही को वह फाईल भी साथ लाने को कहा था। उन्हें पता था जानकी जी आठ बजे तक सारा काम निपट लेती हैं। आबा ने गाड़ी भेजी थी। दोनों आबा-आजी को मिलने निकल पड़ी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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