ताटंक छंद!
नमन माँ शारदे!🙏🙏
छंद महल
( 16+14)चौपाई चरण+ चौदह मात्रा।

यदि दो गुरु है तब कुकुभ।  यदि दो लघु व एक दीर्घ तब लावणी!

ताटंक छंद. ( 16+14) 
1.( चौपाई चरण+ चौदह मात्रा ) पदांत तीन गुरु।

बिखरे आँसू धरती पर हैं, मोल कौन अब जानेगा।
कटी-फटी हैं साड़ी जिसकी, श्रम उसके पहचानेगा।।
मिट्टी से लीपी है काया, माया ठगनी डोलेगी।
तन-मन पर कर वार सदा ही, राज नित्य ही खोलेगी।।

धरती-अम्बर जिसका घर है, खरपतवार बिछौना है।
कौन भला पोंछेगा आँसू, कद जग में जब बौना है।।
खाली थैली, काया मैली, नजरें कामुक सारी हैं।
किस-किस से वह कन्नी काटे, गड्डे गहरे भारी हैं।।

मर्दानी लड़ती नित रण में, बाँध पीठ पर बच्चे को।
ईट संग शिशु ढोती माई, गमछा बाँधे जच्चे को।।
थोथी बातें थोथे ज्ञानी, समझेंगे कब थाती को।
दीप तले है जब अँधियारा, बुझने मत दो बाती को।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं