बिखरी-बिखरी.. बिखरी-बिखरी सी रंगत शाख के झूलों की,
डाल पर मस्ती में खिलखिलाते फूलों की!
वो चहचहाहट कहाँ हैं मासूम परिंदों की,
भूली-बिसरी सी यादें जश्न के बाशिन्दों की!

बादलों के पीछे सूरज की छुपन-छुपाई पर! 
प्राची मुस्कुराई रश्मियों की जादुई झप्पी पर,
बिखरे-बिखरे हैं रंग वसुंधरा की अंगड़ाई पर,
निशा कहकहे लगाए सूरज की मुँह-दिखाई पर!

बातों-बातों में दिल का दर्द बयाँ कर गई बिरहन,
खामोश क्यों प्रियतम बिना प्रिया की धड़कन?
मोहन वीणा के तारों में आई हैं क्यों जखड़न?
पिघल पानी-पानी हुई विरह-ज्वार में अकड़न! 

बिखरी-बिखरी सी रंगत पतझड़ में गुलमोहर की,
शाख से टूटा पत्ता याद दिलाएं शिशिर की!
सूर्य से आँख-मिचौली खेलने की जुर्रत की ,
साक्षी बन बैठे वक़्त की कटु हकीकत की!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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