भाग २३
छुट्टी का दिन होने के बावजूद सुबह-सुबह ही यश नें रेशमी रजाई को पलंग के एक तरफ रख दिया और खुद को आईने में देख तैयार होने बाथरूम की ऒर बढ़ गया... जाते-जाते बंसी काका को कमरे की सभी चीजों को सलीके से रखने के लिए भी कहा...
यश अब तक 'जयपुर फुट' का कुछ हद तक अभ्यस्त हो चूका था... बहुत बार कृत्रिम पैर उसकी सहनशीलता को चुनौती देता लेकिन न जानें किस मिट्टी से बना था वह कि पीड़ा खुद-ब-खुद हार कर खुद में ही सिमट जाती और यश फिर अपने पसंदीदा काम को करने में व्यस्त हो जाता! ज़िन्दगी की तरफ देखने का उसका सकारात्मक दृष्टिकोन ही उसकी ताकत थी और दूसरों की मदद के लिए सदा तत्पर रहने की उसकी आदत उसे ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की असीम ऊर्जा देती थी....
यश नाश्ता-पानी कर बंसी काका की मदद से तैयार हो गया! आज नाश्ते में कांदा पोहे बनायें थे बंसी काका ने और साथ में थी काली मिरी और अजवायान की मठरी ! चाय के साथ खाखरा, खारी पूड़ी-मठरी का मज़ा ही कुछ और होता है न.. स्वाद भी चोखा और एसीडीटी का नहीं धोखा...बचपन से ही यश की आदत थी दूध-चाय के साथ कुछ न कुछ खाने की!
यारों की, दिलवालों की टोली आज यश के यहाँ ही भोजन करने वाली थी! बंसी काका की ढलती उम्र और सेहत को देख यश नें राजस्थानी ढाबे वाले को पांच थाली का आर्डर दे दिया था! मित्र-मण्डली के आते ही अननस के ज्यूस को बनाने के लिए बंसी काका को कह दिया था!
यश आज विनय को बहुत ही मिस कर रहा था! विनय होता तो अब तक तो चार बार फ़ोन आ चुका होता.. दिन- रात उसके दिमाग़ में नुक्कड़ नाटक की ही थीम घूमती रहती! अब तक वो और विभा दस बार विचार-विमर्श करते, बात-बात पर लड़ते-झगड़ते और अंत में प्रभावी संवाद लिख कर उसकी अदायगी पर ध्यान देते और यश, वज्र और वैदेही उनकी इस नोंक-झोंक का मज़ा लेते!
हवा के साथ डोलती विण्ड-चिम यश की यादों को एक लय दे रही थी और यश उन स्वर-लहरियों में खुद को भूलता जा रहा था!
तभी दरवाज़े की घंटी बजी और गायत्री मन्त्र की ध्वनि सुनाई देने लगी.....“ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्”
बंसी काका नें फुर्ती से दरवाजा खोला और हँसी के फव्वारे छुटने लगे... विभा बोल पड़ी, " क्या बात हैं? बड़ा शाइन मार रहा हैं आज! लड़की वाले देखने आ रहें हैं क्या? "
"कम ऑन यार....अंदर तो आओ.. बाद में मेरी बखियाँ उधेड़ना... आराम से..."
अब कुछ महफ़िल में रंग जम रहा था! तभी वैदेही बोल पड़ी.. "यश! यार गला बहुत सूख रहा हैं... कुछ हैं के नहीं यहाँ.. ठण्डा.. ठण्डा...कूल.. कूल!"
वज्र कहाँ चुप रहने वाला था.. बोल पड़ा, " यार! समझ रहें हो न.. चंद्रयान को भी चाँद पर पहुँचना हैं तो ईंधन चाहिए होता हैं ..
अरे चटोरों! मैं तुम्हें जानता नहीं क्या?....सब इंतज़ाम हैं यारों! बंसी काका! पहले ज्यूस लेकर आना.. सब के लिए!
सब यहाँ-वहाँ बेहाल से सोफे पर पसरे हुएं थे.. मानों जनम-जनम के भूके-प्यासे हो ! आज इन मनचलों का ही तो राज था घर में! बंसी काका के हाथ में बड़ी सी सुन्दर तश्तरी में चार बड़े-बड़े क्रिस्टल के सुन्दर मग में पायनापल ज्यूस देख कर सभी उठ कर बैठ गएँ ! एक-एक घूंट के साथ यादों के गुल्लक से पुराने सिक्के टटोलते-टटोलते सभी अपने निर्धारित लक्ष्य की ऒर बढ़ने लगे...
विभा जानती थी.. ज्यादा समय तक यश के लिए खड़े रह कर संवाद बोलना मुश्किलें बढ़ाने वाला अट्टाहास हो सकता था इसलिए उसने यश को एक हाथ में डमरू और एक हाथ में लाठी और बंदरिया को बँधी डोर पकड़ कर संवाद बोलने को कहा! पारी की शुरुआत करने वाला 'ओपनिंग बैट्समैन' यश ही था! सभी ने विघ्नहर्ता को याद किया और यश ने पहला संवाद बोला... तालियों की गड़गडाहट में मानों यश ने पहली ही बॉल पर छक्का मार दिया था!
डुगडुगी बजाते हुए यश बोल पड़ा, " आओ, शहर के प्यारों, कुंवारों और बीबी के मारों, बाहुबलियों और रसूकदारों, नेताओं, अभिनेताओं, आम जम्हुँरियत के क़द्रदानों .. आओ.... बच्चों...देश के नौनिहालों, झूमो नाचो...जश्न मनाओ.. फ्री में रेवड़ियां खाओं... आओ.. अपनी-अपनी डफ़ली बजाओं"
सभी ने दिल खोल कर तालियाँ बजाई.. जब आगाज इतना शानदार था तो अन्जाम क्या होगा? विभा तो खुशी से यश से लिपट गई! 'जादू की झप्पी' पा यश भी बहुत खुश हो गया था ...अब विभा रसोई में काम में आने वाला एप्रन पहन कर आ चुकी थी ..जब यश संवाद बोल रहा था, विभा यहाँ-वहाँ बन्दरिया सी उछल रही थी, नाच रही थी ..वज्र और वैदेही तालियाँ बजा कर मज़ा ले रहे थे और उन्हें प्रोत्साहित कर रहें थे ...
अब डुगडुगी बजाता यश पास में रक्खें लकड़ी के बक्से पर बैठ जाता हैं और बंदरिया नाचते-नाचते यश के कान में कुछ बोलती हैं.. और यश उसका हाथ पकड़ कर कहता हैं, " क्या कहा? इंसान तुमसे भी ज्यादा उछल-कुद क्यों करता हैं?.. हम बंदरों से भी ज्यादा पलटी मारने में उस्ताद क्यों हैं ...क्या उसे अमरत्व का वरदान मिला हैं?
"हे बंदरिया! अच्छा सवाल है! तू तो इंसान से भी ज्यादा समझदार निकली ! इंसान अकेला ही आया, अकेला ही जायेगा... मिट्टी का पुतला है, मिट्टी में ही मिल जायेगा!
बंदरिया! तुझे जानना है एक राज? अमरता का महामन्त्र? चल! बाबा शकुनी के पास.. वो ज्ञानी है... उनकी कृपा बरसेगी न... तू धन्य हो जाएगी!"
बन्देरियां फिर खुशी के मारे नाचने लगती है.. कभी पतली छड़ी उठा कर तो कभी भिक्षा-पात्र उठा कर... मदारी डुगडुगी बजा कर सबका आव्हान करता हैं...दम लगा कर हैय्या ...आओ! जम्हूरियत के रखवालों आओ! दोनों की जुगलबंदी तब तक जारी रहती हैं जब तक बंदरिया के कटोरे में रुपयों की बारिश नहीं होती! नोटों और सिक्कों से भरा कटोरा मालिक को दे कर अब बंदरिया भी तनिक सुस्ता कर मिट्टी में पैर फैला कर बैठ जाती है! सभी बहुत खुश हो जाते हैं! शुरुआत में ही उन्हें फलक पर जीत का मंजर नज़र आता हैं!
दोपहर के भोजन का समय हो गया था और बंसी काका ने फोन कर खाना मंगवा लिया था! भोजन का नाम लेते ही मानों सभी के पेट में चूहें दौड़ने लगे! बंसी काका को यश ने सभी के लिए भोजन की व्यवस्था करने को कहा और सभी हाथ-पैर धोने और फ्रेश होने बाथरूम की ऒर चले गएँ!
बंसी काका नें डाइनिंग टेबल पर भोजन की थालियाँ लगाई और सब को भोजन के लिए आमंत्रित किया! ढाबे की आलू-मटर की सब्जी की सुगन्ध से ही सभी डाइनिंग टेबल की ऒर चल पड़े!
बहुत ही करीने से सजाया था बंसी काका ने डाइनिंग टेबल! एक पीतल के कलश में जल भर कर उसमें गुलाबी कमल पुष्प की कलियाँ सजा दी थी उन्होंने! अध-खिली उन कलियों को देख लग रहा था मानों लक्ष्मी जी वहाँ प्रसन्नचित्त मुद्रा में विराजमान हो गई है और अन्नपूर्णा को देख कृतज्ञता के भाव से अभिभूत हो रही है!
हमारी पुरानी परम्पराएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थी तभी तो आज गंध, रंग, संगीत, नृत्य के जीवन पर पढ़नेवाले अद्भुत प्रभाव पर वैज्ञानिक शोध कर रहें हैं! पुरानी खूंट सी हड्डियोंवाली अनुभवी पीढ़ी वातावरण पर पड़ने वाले जीव-अजीव के प्रभाव को समझती थी और इसीलिए उन्हें अटूट विश्वास था अपनी मान्यताओं पर! बंसी काका को भरोसा था कि भोजन अगर प्रसन्न-निर्मल भाव और सुचिता से किया जाय तो वह मन को सकारात्मकता से भर देता हैं!
यश ने वज्र के लिए कम घी-तेल युक्त सब्जी और फुल्के मंगवाएँ थे और साथ में दाल-चावल! सभी मित्र उसकी पूरी साज-संभाल कर रहें थे...राजस्थानी ढाबों पर बनी सब्जी और सलाद का मज़ा ही कुछ और था! यह परिवहन तथा संचार क्रांति का ही कमाल था कि रेत में निपजी सब्जी का स्वाद घर बैठे हम मुम्बई में ले पा रहें थे !
विभा खाने की बड़ी शौक़ीन थी.. वैदेही को वेजिटेबल बिरयानी बहुत भाती थी! यश की तो कद-काठी देख कर ही पता चलता था कि यह खाते-पीते घर का कुलदीपक है! सभी खुले दिल से भोजन का लुत्फ़ उठा रहें थे तभी वैदेही बोल पड़ी, " यार! कुछ मीठा हो जाता तो... अभी उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था और बंसी काका नें आम की बर्फी से भरा सुन्दर कांच का बाऊल डाइनिंग टेबल पर रख दिया! चाँदी का वर्ख लगी आयाताकार केसरिया बर्फी से भरें बाऊल को देख सभी के मुँह में पानी भर आया! सभी लपक पड़े और हँसी-हँसी में एक-दूसरे को खिलाने लगे! सब की मनुहार बाकी रह गई थी और वो कमी भी यश नें पूरी कर दी!
युवाओं की यह जीवट, जिंदादिली देख बंसी काका की आँखें खुशी से भर आई! गुलाब को छूने में लगे थरथराते हाथों को चुभे कांटे सा अपने एकलौते बेटे की मौत पर कोरोना काल में कन्धा भी न दे पाने का गम उनके मन के प्याले से छलक गया और वो आँखें पोछते-पोछते रसोई की तरफ चले गएँ! कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो वह आज बेशक़ यह नहीं बता पाता कि कौन से आँसू खुशी के थे और कौनसे दुःख के...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई|
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