तिनका
एक तिनका उठा धरातल से
अपनों के हठ आंचल से,

मैं हवा के रुख से बढ़ जाऊँगा
जल्दी ही मैं उड़ जाऊँगा,

आस जगी तो छोड़ दिया,
अपनों से मुख को मोड़ दिया,

चलने लगा गगन की ओर 
जहाँ हवा का रुख था जोर,

देख-देख वैभव इस नभ का 
हुआ प्रफुल्लित मन इस कण का,

फिर एक बूंद गिरी नभ से इस पर 
तो तिनका गिरा धरातल पर,

न अपनों का साथ मिला 
न नभ के वैभव का रास मिला,

रह गया अकेला इस पथ में 
सब छूट गए उसके मद में,

संग सबको लेकर चलना था 
अकेले ही न निकालना था!


द्वारा Kapil Tiwari
Shared11 Sep 2025
Start 11 Sep 2025
End 11 Sep 2030
इस पर लोग क्या कह रहे हैं