ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ७३
भाग ७३

मित्र-मण्डली कॉलेज की लायब्ररी में बैठी थी। वज्र और वैदेही की परीक्षा अप्रैल के अंतिम सप्ताह से शुरु होने वाली थी तो विभा की दूसरे सप्ताह में। सब से अंत में यश की परीक्षा थी...मई के प्रथम सप्ताह में। इसीलिए सभी ने एक घंटा कम से कम लायब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई करने का निर्णय लिया था।

साथ-साथ पढ़ने का मजा ही कुछ और था। खेल-खेल में, बातों-बातों में पढ़ाई हो जाती थी। यश, वज्र और वैदेही वाणिज्य शाखा के विद्यार्थी थे तो उनके लिए एक-दूसरे से विचार-विमर्श कर, शंका का समाधान कर पढ़ना आसान हो जाता था।  विभा का साहित्य का क्षेत्र था। वह एक बार पढ़ने बैठती तो उसी में खो जाती मानों आकाश में खोया तारा! सबकी एकाग्रता गज़ब की थी। बीच-बीच में यश के चुटकुले तनाव को दूर करते! 

लक्ष्य के प्रति उनकी दीवानगी गज़ब की थी फिर वह खेल में हो, पढ़ाई में या दुनियादारी में! किताबें तो वो पढ़ ही रहे थे लेकिन ज़िन्दगी की किताब का अनुभव उन्हें और उनके ज्ञानभंडार को समृद्ध बना चूका था। यहीं वजह थी कि वह हर कहानी को अपने पक्ष में, अपने हिसाब से मोड़ देते थे।

पढ़ाई के बाद विभा, यश, वैदेही और वज्र घर की ओर निकल पड़े। आज यश के माता-पिता जयपुर जाने वाले थे। यश ने छोड़ने आने की बात कहीं लेकिन पिताजी ने साफ़ मना कर दिया। विभा यश को छोड़ घर की ऒर निकल चुकी थी। 

लाली उसका इंतज़ार ही कर रही थी। अब तक किताबों में व्यस्त विभा को ध्यान ही नहीं रहा कि लाली अब तक भूखी होगी वरना वह फ़ोन कर उसे खाना खाने के लिए कह देती। लाली दिल की बड़ी भोली थी। गाँव के निर्मल,  साफ़-सुथरे वातावरण में पली-बढ़ी!  इसीलिए विभा को डर लगता था कि कहीं कोई उसे बहला-फुसला न दे!

इस बार उसका रंग-ढंग देख कर विभा उसे कराड छोड़ आने का सोच रही थी। आजकल पढ़ाई में उसका बिल्कुल मन नहीं लगता था। जब देखो तब चेहरे के रंग-रोगन में लगी रहती। रहन-सहन तो उसका पहले से ही अच्छा था। 

विभा के मन में कई आशंकाएँ  एक साथ फन फैलाएं खड़ी हो जाती। माना कि यह उम्र ही सजने-संवरने की थी लेकिन इसी उम्र के लिए बढ़े-बूढ़े कहते हैं, " सोळाव वरिस धोक्याचं ग...सोळाव वरिस धोक्याचं ..."

आजकल  विभा ने नाके के फूलवाले को किसी न किसी बहाने लाली से बात करते देखा था। उसके चेहरे के हावभाव देख कर विभा अनायास ही क्रोधित हो जाती। उसने एक दिन लाली को टटोलने के लिए कह दिया, " लाली !  नीचे के फूलवाले से अब हम हार नहीं लेंगे दोनों टाइम! मैं दूसरे फूलवाले को कल फ़ोन कर फूल देने को कह दूंगी! " 
विभा का वाक्य समाप्त होने से पहले ही लाली बोल पड़ी, " नहीं...नहीं दीदी! वह तो बहुत अच्छा हैं! बहुत प्यार से बात करता हैं। मुझें कुछ भी चाहिए तो ला कर देता है। आप घर में नहीं हो तब भी मेरी मदद करता हैं! मुझें अच्छा लगता हैं उससे बात करना, उसके साथ हँसी-मज़ाक करना!" भोली भाली लाली विभा के एक ही पैतरें में सब कुछ उगल गई थी। 

विभा के मन में अब लेशमात्र ही शंका बाकी नहीं थी। वह समझ चुकी थी कि उसका जादू लाली पर चढ़ गया हैं और यहीं वजह हैं कि वह कराड रहना नहीं चाहती। भोली भाली लाली! विभा ने पूछा, " क्या नाम हैं उस छोरे का? ! कहाँ रहता हैं वह? कौन-कौन हैं उसके घर में? 
"कुछ भी नहीं मालूम दीदी जी" कली बोल पड़ी।

सवालों की तोफ से अचानक एक साथ दागे गए इतने गोलों को लाली सह न सक़ी! वह रोने लगी! विभा ने उसके बालों में उंगलियाँ घुमाते-घुमाते कहा, " लाली! प्यार करना गलत नहीं लेकिन अंधा बन कर प्यार करने का मतलब आगे चल कर धोका खाना ही होता हैं। किसी के लिए भी बिना परखे घर के दरवाजे खोल देना मूर्खता हैं! भोली हो तुम! कोई भी तुम्हारा गैरवाजिब फायदा उठा सकता हैं! समझ रही हो न! वह तुम्हारे लायक होगा तो मैं तुम्हें मदद करुँगी लेकिन लक्ष्मणरेखा लांघोगी तो....

लाली फूट-फूट कर रोने लगी! "दीदी जी! गलती हो गई। माँ को मत बताना! वह तो मुझे जिन्दा गाड़ देगी! "
विभा लाली की यह दशा देख पशोपेश में पड़ गई। उसने लाली को सांत्वना दी और पुचकारते हुए पूछा, "लाली! एक बात पूछूँ? सच-सच बताओगी न ?"
लाली ने हाँ में गर्दन हिलाई! 

विभा ने सीधे-सीधे पूछा, "क्या उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाएं है तुमने? लाली फिर जोर-जोर से रोने लगी! विभा को जवाब मिल गया था। वह सिर पर हाथ मार कुर्सी पर बैठ गई। अब क्या किया जाय जब चिड़िया चुग गई खेत? 

विभा पल भर के लिए सुन्न हो गई। करें तो क्या करें? विभा का दो दिन उसे अकेला छोड़ पूना जाना शायद सांड के लिए खेत को तबाह करने का बेहतरीन मौका था जिसका फायदा उसने बखूबी उठाया था! फूलवाले की तरफ से उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी! फिर भी उसने जानकारी हासिल करने की कोशिश की। एक नाबालिग लड़की को उसने फंसाया था। 

लाली रो-रो कर बेहाल हो गई थी। विभा ने खुद भी खाना खाया और लाली को भी जबरदस्ती खाना खिलाया और ताकीद दी कि अब अगर उससे मिलोगी तो तेरा-मेरा रिश्ता ख़त्म! 
"सोचती हूँ.. आगे क्या करना हैं! तुम काम निपट कर सो जाओ! मुझे उस बन्दे का मोबाइल नंबर और तुम्हारा मोबाइल दो" 
लाली ने मोबाइल विभा को दिया और वह रोते-रोते काम निपटने लगी।

विभा ने उस नंबर पर फ़ोन लगाया। सामने से फूलवाले  की आवाज़ आते ही उसने फ़ोन कट कर दिया ।  विभा ने जान-बुझ कर दो-तीन बार इसी प्रक्रिया को दोहराया। 

अगले पंद्रह मिनट बाद फूलवाला द्वार पर खड़ा था। विभा ने उससे हिसाब पूछा लेकिन उसकी नज़र किसी को ढूंढ़ रही थी। उसने डायरी देख कर बताने की बात कहीं और जाने लगा। विभा ने उसे विघ्नहर्ता का प्रसाद देने के बहाने बैठाया, सरकारी योजना के बारे में बता कर उसे मदद करने का आश्वासन दिया और पूछताछ शुरु की उसके गाँव, परिवार, पढ़ाई-लिखाई के बारे में! 

विभा का अंदाजा बिल्कुल सही था। वह शादीशुदा, दो बच्चों का बाप था, माता-पिता और छोटी बहन भी रहती थी साथ में। उत्तरप्रदेश के सुदूर गाँव से था। रोजी-रोटी के लिए यहाँ आया था। रात को वहीं टपरी पर सोता था। न घर न नौकरी! इतना बड़ा परिवार! विभा ने प्रसाद के रूप में कल लाएं दो गुलाब जामुन उसे थमाएं और कल से फूल न देने का कह कर उसे अब तक का बिल खुद वहाँ टपरी पर आकर चूकाने की बात कर विदा किया।

कमरे के अंदर बैठी लाली दोनों की बातें ध्यान से सुन रही थी। उसे अपनी मूर्खता का पूरा प्रमाण मिल गया था। विभा समझ चुकी थी कि उस फूलवाले के लिए लाली सिर्फ मनोरंजन और वासनापूर्ति का साधन थी.. प्यार-व्यार का कहीं दूर-दूर तक नामोंनिशान भी नज़र नहीं आ रहा था। सभी ऒर अँधेरा ही अँधेरा था...रोशनी की नन्ही सी किरण उस डरावनी गुफ़ा में ढूंढना जरुरी था! एक नाबालिग किशोरी के जीवन-मरण का सवाल था।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....

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