बोल सको तो मीठा बोलो।
विष वाणी में प्रिय मत घोलो।।
घाँव शस्त्र के मिट जाएंगे।
बोल नहीं कटु सह पाएंगे।।
जीभ बला सब लाती भारी।
वक़्त हरे कब पीड़ा सारी।।
बोलो तोल-मोल कर प्यारे।
खेल-खेल में वारे-न्यारे।।
अनुनय-अनुभव-अधिक निराले।
तेज अगन पर नीर गिरा ले।।
क्रोध चिता को कर दे ठण्डी।
सिर्फ असुर वध हित बन चंड़ी।।
यदा-कदा मधु बोले बोली।
स्वार्थी खल की लागे टोली।।
राम नाम हैं मुख पर राही।
पाप कर्म में लीन सदा ही।।
कलुषित मन दूषित काया।
छूटे कैसे अरि से माया।।
पाप कुन्ड में गोते खाता।
घर बाहर कब मनुज सुहाता।।
नन्ही जिव्हा की ताकत जानों।
लालीबाई को पहचानों।।
संभल-संभल कर मुख खोलो।
मनवा! सब के साथी हो लो।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।