रोला छंद!
नमन माँ शारदे 🙏🙏
रोला छंद



पिया गए परदेस, जले है मन में ज्वाला।
उमड़-घुमड़ कर मेघ, भरे है अमिरस प्याला।।

कोयल गाए गीत, सुनाए प्रियतम गाना।
जल्दी-जल्दी आज, सखी घर साजन आना।

मीठे मधुमय बोल, मधुर सुन मनवा डोले।
आनंदित हो आज, सखी चल होले-होले।।

कहती विरहन तोड़, लाज के बन्धन सारे।
पिया मिलन की आस, सजन बिन सुध-बुध हारे।।

शशिधर उलझा देख, चांदनी चम-चम चमके।
भूली रजनी प्रीत, फूल बहु महके-बहके।।

वाट जोह रति हार, मदन से बोले झूठा।
लाख कोशिशों बाद, आज क्यों सावन रूठा।।

बूँद-बूँद से देख, प्रिया का भीगा तन-मन।
नाच-नाच कर मोर, कहे आ पहला सावन।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



इस पर लोग क्या कह रहे हैं