बाला छंद

बाला छंद (वर्णिक छंद)
3 रगण +गुरु = 10 वर्ण 
(212 212 212 2)


रात में तारिका है लुभाती।
चांदनी में नहाने बुलाती।।
चन्द्रमा की कला मोह लेती। 
कुंतलों को खुला व्योम देती।।

रागिणी मीत की गा रही है।
मोहिनी प्रीत की छा रही है।।
रातरानी खिली अंगना जी।
प्रेयसी के बजे कंगना जी।।

होड़ सी हैं लगी दो तनों की।
चाहतें हैं कई दो मनों की ।।
प्रेम की डाल पे डोल गाते।
नैन से नैन ही बोल पाते।।

यौवना पी गई भंग प्याला।
कंचुकी का खुला तंग ताला।।
धुंद सी छा गई कालिमा से।
चुनरी दाग की लालिमा से।।

तोड़ माँ-बाप का क्यों भरोसा।
दर्द  स्नेही जनों को  परोसा।।
लाँघ दी देहरी मस्त हाला।
दूध का कर्ज भी फूँक डाला।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं