दिसंबर की ठण्ड में बाल्कनी में लगे झूले पर झूलती रश्मि ने पूरी रात सितारे गिनते-गिनते ही बिताई! न जाने क्यों उसे निशा के धैर्य पर क्षोभ हो रहा था....आखिर क्यों वह कुक्षी में पल रहे सूरज की नादानियाँ नि:शब्द हो कर सह रही थी! प्राची ने भोर का आगाज किया और पंछियों ने सुर-ताल की संगीतमय महफ़िल सजाई! सूरज अपने तेजस घोड़ों के रथ पर सवार हो कर क्षितिज को आलिंगन दे वसुंधरा पर अपनी रश्मियाँ बरसाने निकल पड़ा था...मानो रश्मि के सपनों के राजकुंवर सा!
नित्यकर्म निपट कर वह कॉलेज जाने को तैयार हो चुकी थी और जेसीका का इंतज़ार कर रही थी!
रश्मि की धड़कनों ने धमा-चौकड़ी मचा रक्खी थी मगर रोज समय पर आनेवाली जेसीका आज आई क्यों नहीं? तभी उसकी कामवाली बाई ने एक चिट्ठी उसके हाथ में थमा दी और वह चल पड़ी!
उसने चिट्ठी पर नज़र दौड़ाई और मन ही मन बुदबूदाई... इसे भी आज का ही मुहूर्त मिला था बीमार होने के लिए... और वह झट से अपनी बड़ी पर्स उठा कर तेजी से चल पड़ी कॉलेज की ऒर...
अभी-अभी वह पुल तक पहुंची ही थी कि उसे किसी बाइक के पास में रुकने का आभास हुआ... नदी की चंचल लहरों को निहारती रश्मि ने पास में ठहरी मोटरसाइकिल की तरफ देखा और पल भर वह देखती ही रह गई! रात भर हर सितारे में वह जिसका चेहरा ढूंढ रही थी, वह 'डैशिंग पर्सनालिटी' उसकी बगल में खड़ी थी! पल भर के लिए मानो वह मुक-बधिर सी हो गई थी... "बैठिएँ पीछे... बाइक पर.. मैं कॉलेज ही जा रहा हूँ! क्या सोच रही है आप? एक उभरती राष्ट्रीय खिलाडी का समय का पाबंद होना बहुत जरुरी है जी!"
रश्मि निशब्द खड़ी थी! ऐसे लग रहा था मानों किसी ने उसे हिपनौटाइज कर दिया हो..वहआज्ञाकारी नन्ही बच्ची सी पिछे बैठ गई!
हवा से बातें करती बाइक पर बैठ सैर करने का मजा ही कुछ और होता है न...वो भी तब जब दोनों यौवन की दहलीज पर खड़े हो और प्यार की तिलिस्मि गुफ़ा के द्वार पर 'खुल जा सिम-सिम' कह कर दस्तक दे रहें हो!
सुनहरी सुबह में हवा के झोंके बदन को बार-बार स्पर्श कर रहें थे! बिच-बिच में रास्ते में आ रहें गड्डे और उतार- चढाव उसे मनमीत के गठिले शरीर की गर्मी का भी एहसास करा रहें थे...
कॉलेज के निकट के गुलमोहर को देख वह आभासी दुनिया से असल दुनिया में लौट आई! बाइक रुक चुकी थी और वह उतरने का प्रयास कर रही थी! उतरने के प्रयास में उसकी चुनर अटक गई थी... बन्दे ने होले से चुनर को सहेजा और उलझे छोर को निकाल कर सही-सलामत रश्मि के हाथों में दिया!
धन्यवाद मिस्टर... वह आगे कुछ बोलती उसके पहले ही वह बोल पड़ा... शौर्य वर्मा! थर्ड ईयर.. बी. एससी. का विद्यार्थी हूँ...कॉलेज बैडमिंटन टीम का कप्तान भी...
और उसने हाथ आगे बढ़ाया...
"जी! आपसे मिलकर खुशी हुई.. मैं, रश्मि अग्रवाल... फर्स्ट ईयर बी कॉम की विद्यार्थिनी हूँ.."
"जानता हूँ... बोल्ड & ब्यूटीफुल!" और वह फुर्र हो गया!
मुश्किल से रश्मि सम्मोहन से बाहर निकल पाई थी और फिर वह कॉमर्स कॉलेज भवन की ऒर बढ़ने लगी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
शेष अगले भाग में....