अब तो अंधेरें मुझे.. अब तो अंधेरें भी मुझे ड़राते नहीं,
मुश्किलें भी राह से डिगाती नहीं,
खौफ़ के साये हौंसले चुराते नहीं,
धूप-छाँव में लक्ष्य से भटकाते नहीं!

अंधेरों से क्यों डरें हम मान्यवर?
रात की कोख में पलता दिवाकर!
अंधेरों के बगैर उजालों के क्या मायने?
प्राची दिखायेगी मानवता को आईने!

कोयले की खदान में छुपे तेजस्वी हींरे
काली मिट्टी में निपजे धान के टोकरे!
काले बादलों में छुपे जल-बूंदों के मोती,
काले श्याम की बांसुरी से राधा की प्रीती!

सहयाद्री के काले पत्थरों में गुंजा 'हर हर महादेव'
अरावली की पहाड़ियों में नाचे काल- भैरव!
कारी जमुना का प्रयागराज में गोरी गंगा ओढ़े दुशाला!
दीए तले अँधेरा पर जगत को दे उजाला!

 स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • लाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️
  • बहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏