मनहरण घनाक्षरी पर आधारित रचना

(मनहरण घनाक्षरी छंद पर आधारित )
शीर्षक : मन!

मनुज जनम पाया,
सत्य मार्ग अपनाया 
प्रभु को मन में ध्याया,
कर्म योग धारिए।

जीवन यशस्वी सदा,
निराशा हो यदा-कदा,
दुष्ट पर उठे गदा,
शोषित को तारिए।

खुल कर मनु जिया,
अमिरस घट पिया,
मार्ग आलोकित किया,
मन को न मारिए।

कभी मन की भी करो,
जन की भी पीर हरो,
खुद में विश्वास भरो,
हार को नकारिए।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं