नारी होना भी एक अलग एहसास है...
ना दिखने वाली कोई आदि शक्ति उसके पास है...
हर नारी लगती तो साधारण पर बात सब में कोई ख़ास है...
भेद होता आया साथ उसके, कल भी और आज है...
कैसे भूल जाता है ये समाज कि नारी से भी तो ये समाज है...
दुखों का समंदर लिए, बाहर से वो मुस्कुराती है...
बड़ी मुश्क़िल से कटता है दिन, रात होते होते सारे ग़म छुपाती है...
फिर आंसू पोंछे कोई उम्मीद उसकी और सुबह हो जाती है...
हर मुश्किल से लड़ जाती है कर जाती सबका भला है...
ये आज की नारी है, ना कोई अबला है...
बहुत कुछ है खोया उसने, ईमानदारी से पाया एक क़िरदार है ...
जीत ना पाती अपनों से हार उसकी कुछ शानदार है ...
दिनभर की जिम्मेदारियां न लगती उसे कभी बोझ हैं ...
क्योंकि प्यार है, फिक्र उसे अपनों की हर रोज़ है...
रोज़ निकले कमी उसकी, मिल ही जाता कोई ताना है...
रोज़ है मरती फ़िर भी ढूंढ़ती जीने का बहाना है...
वक्त नहीं किसी के पास उसके लिए, बात उसकी नहीं सुनी जाती है...
और वो वक्त से भी सबके लिए वक्त चुराती है...
समझता है हर कोई कि समझती नहीं कुछ
नादान है समझने का नहीं है होश...
पर समझती है सब बस रहती है खामोश...
बच्चों जैसी ख़ुशी उसकी अपनों की ख़ुशी में ही खुश हो जाती है ...
और फिर से उसकी ख़ुशी अपनों में गुम हो जाती है...
सत से कलयुग तक परिस्थितियां यही कह जाती हैं...
कि हर नारी है ख़ुद में ख़ुद की एक कविता लेकिन किसी की कहानी बन कर रह जाती है...
मां, बेटी, बहिन और पत्नी निभाए ईमानदारी से उसने ये किरदार हैं...
ना पैसा, ना शौहरत चाहे, थोड़ी इज़्ज़त की तो हकदार है...
खो ना दे ख़ुदको कहीं बनाना चाहती एक पहचान है...
ख्वाहिश बस उसकी एक अपना आसमान और सपनों की उड़ान है।।
{जानवी कारयानी}