अंतरिक्ष की सैर

अंतरिक्ष की सैर

सौमित्र और सखी को हमेशा रोमांचक, साहसपूर्ण सफर अच्छा लगता। कभी दोनों हाथों में हाथ धर पहाडी पर घुमने जाते, कभी घुमावदार रस्ते पर उतार चढाव का आनंद लेते। कभी नदियां की लहरों से खेलते, कभी नौकानयन करते।नवीनतम मंदिर दर्शन करना मन में भक्ति भाव भर देता। आज दोनों ने ठान लिया, अंतरिक्ष सैर कर इस नीलाभ गगन के आंचल में उन्मुक्त उड़ान भरेंगे। विचरण करते पंछीगण से बातें करेंगे। झिलमिल 
तारों संग लुकाछिपी खेलेंगे। पतंग की डोर पकड झूलेंगे। चंदा मामा से मिल बुलावा दे आयेंगे। सूरज दादा को थोडासा नवास बरसाने की बिनती करेंगे। बादल सवार हो अंतरिक्ष जायेंगे। एक नयी दुनिया की खोज में सफर जारी रहेगा।मंगल पर छोटासा जमीन का टुकडा खरीद लेंगे। वही पर छोटासा बंगला बनायेंगे। नाचेंगे, गायेंगे, खूब धमाल करेंगे। हवा में उडते उडते धरा का अवलोकन करेंगे। 
"अरे, अरे, अपना गुब्बू डाॅगी नीचे ही रह गया।"
"सखी, गुब्बू दिख नहीं रहा है।"
सखी सुनते ही जोर-जोर से रोने लगी।सौमित्र झट से जाग गया। 
अंतरिक्ष सफर केवल परिकल्पना थी। सुहाना सपना था।

स्वरचित मौलिक लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र 


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