परीक्षा

"कौनसी बोर्ड  की परीक्षा है तेरी? आ जा, चिल मार यार।" भाविका मनुहार कर रही थी।
" मम्मी ने टिफिन भरकर गाजर का हलवा भेजा है। यम्मी, टेस्टी...इतना स्वादिष्ट कि.....उंगलियां चाटती रह जायेगी।"
सर्दी का मौसम। राधिका कंबल ओढ सोते-सोते ही पढ़ रही थी। हीटर लगाने के बाद भी उसे ठंड लग रही थी। मेड़ चंपा दीदी को अदरक वाली मसालेदार चाय बनाने के लिए कहा उसने। चाय पीकर मन तरोताजा हो गया। चंपा दीदी का शुकराना कर वह पढ़ने बैठ गयी।
चार सहेलियां मिलकर किराये के मकान में साथ रह रही थी। बस ये आखरी साल था। घर जाने को उतावला हो रहा था मन। मम्मी के हाथों बना गरम लच्छा परांठा, नवरतन सब्जी... दाल का हलवा...याद तो बहुत  आती है, पर कुछ बनना है तो मेहनत और लगन से पढ़ना ही होगा। माता पिता की आकांक्षाओं पर खरा उतरना होगा। अपने लक्ष्य पर अडिग रहना होगा।
कही नहीं जाना हैं मुझे। समय व्यर्थ न गंवाना है। एक बार पसंदीदा कोर्स में प्रवेश पाने में सफलता मिल जाये, करिअर  बन जायेगा। तब तक... थोडा सा अपने आप पर नियंत्रण रखना ही होगा।

स्वरचित मौलिक लघुकथा
चंचल जैन
मुंबई,  महाराष्ट्र 



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