कुंडलिया छन्द में...
1.
मीरा गिरधर को भजे, भूली सारा काज |तानपुरा ले गा रही, जोगण मीरा आज ||
जोगण मीरा आज, छोड़ दी जग की माया |
कृष्ण-भजन में लीन, मोड़ मन कंचन काया ||
सब आभूषण त्याग, राजसी ढूंढा हीरा |
लोक-लाज सब भूल, भजे है गिरधर मीरा ||
2.
ज्ञानी गुरु की वंदना, ज्ञानार्जन प्रण मात्र ||
कृष्ण-सुदामा हैं सखा, दोनों गुरुकुल छात्र |
दोनों गुरुकुल छात्र, करें नित गुरु की सेवा |
विपदा में दे साथ, मिलें गुरु वाणी मेवा ||
पावन मन के भाव, शुद्ध अति गंगा पानी |
भव-भव तारणहार, करुँ गुरु वंदन ज्ञानी ||
3.
मुश्किल में हो साथ जो, मैत्री की पहचान|
कर विपदा का सामना, जीती बाजी जान ||
जीती बाजी जान, मनुज बुन ताना-बाना |
भागीरथ कर यत्न, सफल हो आना-जाना
गंगा बहती धार, प्रलय की बेला दुर्मिल |
दोस्ती का उपहार, हमसफ़र होगी मुश्किल ||
4.
लक्ष्मीजी की हो कृपा, ज्ञानी का हो मान|
मानव प्रभु दरबार में, वाणी का हो भान ||
वाणी का हो भान, सदा हो प्रकृति पूजा|
माता का उपकार, पिता सम कोई दूजा ||
धन कुबेर का मान, सकल साथी-संगी जी
मेघा ऊँचा स्थान, कृपा कर दो लक्ष्मीजी ||
5.
उखड़ी-उखड़ी चाल हैं, कृष्ण वर्ण ये गाल |
गालों पर मिट्टी लिपी, उलझे-उलझे बाल
उलझे-उलझे बाल, गात पर नजरें अटके |
बोले पीड़ा हार, नयन से आँसू टपके ||
निर्धनता हैं शाप, शक्ल हैं बिगड़ी-बिगड़ी |
जीवन कारागार, चाल हैं उखड़ी-उखड़ी ||
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |