"दादी! बहुत बिजी हो गया हूं मैं! फाइनल एग्जाम चालू हो गए हैं मेरे! यश भईया कब आ रहा है 'नानी हाऊस'? "
मैं जवाब देती तब तक धैर्य लिफ्ट से नीचे उतर चुका था!
गर्मियों की छुट्टियां और 'नानी हाउस' की सुनहरी, लड़कपन की यादें...बचपन के वो खरगोश से शुभ्र, धवल मखमली पल! इम्तहान का अंतिम पर्चा खत्म होते ही परिंदे आसमान नांपने को उतावले हो जाते थे ...मानो अभिभावकों की क़ैद से आज़ाद हुए परिंदे!
कितना आकर्षण था नाना-नानी, मामा-मामी, भाई-बहन, हमउम्र अड़ोसी-पड़ोसी, दोस्तों का...न कोई रोक-टोक, न कोई बंधन.. स्वच्छंद बादलों सा बचपन!
धैर्य का एक वाक्य मुझे मानों हाथ थाम कर यादों के दिलकश गलियारों की सैर कराने ले गया!
कितना सुहाना था वो बचपन का सफ़र! पुराने मराठी बालगीत की पंक्तियां मन के गोल गुंबद में रह-रह कर सुनाई दे रही थी! बार-बार गूंजती प्रतिध्वनि मन को झकझोर रही थी!
"झूक-झूक झूक-झूक अगीन गाडी,
धूरांच्या रेशा हवेत सोडी, पळती झाड़े पाहूया..
मामाच्या गांवाला जाऊ या..."
यह गीत गाते-गुनगुनाते हम घर पहुंच जाते थे और बस्ता सोफे पर फेंक कर माँ से लिपट कर पूछते थे...."कब जायेंगे हम मामा के घर? इस बार मैं अपना किचन का नया सेट साथ लेकर चलूंगी... और हाँ... मामा को बोलना... हमें प्राणी संग्रहालय दिखाने ले कर जाएं...हम बिल्कुल मस्ती नहीं करेंगे..."
मामा का घर...आज का 'नानी हाऊस' हमारे लिए सपनों का नीला आकाश था! कल्पना के सुनहरे, तेज़ घोड़ों पर सवार होकर हम मानों परियों के देश घूम आते थे! लौटते वक़्त हमारे हाथ में होते थे समंदर किनारे इकट्ठा किएं हुए शंख, सीपियाँ, चमकीले पत्थर, बेशुमार खुशियों के पानीदार असली मोती और प्रकृति माँ के ढेरों आशिष !
न स्कूल की पढाई का झंझट, न माँ-बाबूजी की डांट, न सुबह जल्दी उठने की चिक-चिक, न रात को जल्दी सोने की झिक-झिक! बस मौजा-ही-मौजा, खेलो-कूदो, नाचो-गाओ, खाओ-पीओ, सब मिल मौज मनाओ!
संयुक्त परिवार, भरा-पूरा परिवार! डगमगाते कदमों का साथ, थरथराते हाथों के आशिष, मामा-मामी, भाई-बहन का प्यार-दुलार! गांव की महलनुमा हवेलियाँ, बड़े-बड़े आँगन, आँगन में बँधी गाय-भैंस, और द्वार पर पहरा देता 'मोती'....
यादों के बवंडर भटक रही थी तभी धैर्य की आवाज़ ने मुझे यादों के गलियारे से यथार्थ के धरातल पर ला पटका... मानों आम के पेड़ से एक पका हुआ आम जमींपर गिर गया था!
वह बहुत ही उत्साहित था! एक हाथ में आय-पैड और दूसरे हाथ में किताब लिए वह बोले जा रहा था!
"दादी! पापा ने फ्लाइट की बुकिंग करा दी है! हम इस बार मालदीव जा रहे हैं वेकेशन में...ये देखो...ये बीच पर.."
मैं नि:शब्द थी! आसमान वहीं था, समंदर भी वहीं! कुछ बदला था तो वह था किनारा...एक तरफ मातृभूमि का लहराता आँचल तो दूसरी तरफ अनजान देश की हथेलियों से फिसलती रेत!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।