तर्ज:आशुतोष शशांक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
आदिनाथ अरिहंत मेरे।
प्रभु प्रथम जिनेश्वरा ।।
दूर करो आतम के अंधेरे ।
हे मेरे परम परमेश्वरा।।
दो ज्ञान ध्यान संज्ञान मुझको।
सम्यक दर्शन देवता।।
हे तार तिर्थंकर हमें तुम।
जो जो भी तुम्हें सेवता ।।
रख चरणों में हमको प्रभु तुम।
शरण में मैं तेरी गहूॅं।।
कर्म बंधन तोड़ो तुम मेरे
मैं निकट आपके रहूॅं ।।
हो विकट कोई परस्थितियां।
कर्म वश किसकी कभी।।
दूर करना बनों राहगीर तुम ।
हटा दर्द संसारी सारे सभी ।।
अविनाशी अविकारी जिनेश्वर ।
तुम देवाधी देव हो।।
तुम अमर तेरी उर अमर वाणी ।
गूंजेगी सदैव हो ।।
तुम दयालु ,कृपालु भगवन।
तुम भव तारण त्योहार हो ।।
तुम माता मरूदेवा के नंदन।
तुम परम अवतार हो।।
नाभी कुल के कुलिन कंधे ।
किये जग पे उपकार हो।।
सिखलाए कृषि- असी -मसी।
आप जगत के सार हो ।।
तुम तपस्वी त्यागी तुम हो।
करें हम तेरी आरती ।।
ऋषभ जिनेश्वर वृषभ लांचन।
भक्ति तेरी हमें तारती ।।
नहीं हैं मुझको ज्ञान इतना।
कैसे करूं तेरी साधना।।
नहीं जानता विधी विधान कोई।
नहीं जानूं मैं आराधना ।।
मैं तो बस इतना ही जानूं ।
प्रभु निश्छल निर्विकार है।।
इसलिए वितरागी जिनवर की।
छवि मुझे स्वीकार है।।
स्वरचित:अशोक दोशी