शादी के बाद झमकू की दीदी पहली बार ही मायके आ रही थी! झमकू ही नहीं गौशाला की गायें, बछडें भी बहुत उत्साहित थे दीदी को मिलने को.... दो-तीन बार झमकू का हाथ चाट-चाट कर उन्होंने संकेत भी दे दिये थे! आज हरी-भरी घास देख टूट पडे थे वो उस पर! दीदी हैं ही इतनी प्यारी! घरवालों की ही नहीं, मोहल्ले वालों की भी चहेती थी वो! न गुस्सा, न शिकवे-शिकायतें! अपना हो या पराया...बस! प्यार, दुलार ही तो बांटती थी वह! किसी को मुसीबत में देखा नहीं कि सीधी भागी उसकी मदद करने..न खुद की भूख-प्यास की चिंता, न ख़र्च की परवाह... मानों भगवान ने अपनी जगह उसे ही भेज दिया हो दुनिया वालों की खैर-खबर लेने के लिए!
तभी टम-टम की आवाज आई और झमकू दौड़ी चली गई दीदी से गले मिलने! प्राची की आहट लगते ही आंखों से ओस-बिंदू बिखरने लगे! पलकों पर ठहरें मोती सुनहरी रश्मियों में चमकने लगे! 'जादु की झप्पी' पा कर वह अभिभूत थी!
कितनी अकेली पड गई थी वो दिदी के ससुराल जाने के बाद! किससे करें मन की बात? किसके सामने खोले दिल के गुलाब की सुकोमल पंखुड़ियां? मां-बापूजी के साथ गौशाला का काम करने और पशुओं की देखभाल करने में ही पता नहीं चलता था कब मुर्गे ने बांग दी और कब सूरज मोतीचूर के लड्डू दुनिया को बांट, छुप गया दरख्तों के पिछे!
कुछ दिनों से मां-बापूजी व्यस्त थे झमकू के लिए रिश्ता ढुंढने में और जब भी देखो इसी विषय पर विचार-विमर्श में व्यस्त नजर आते ...कब 'छोटिडी' के हाथ पिले कर दे और कब चारधाम की यात्रा पर निकल पड़े....
झमकू...वह तो दिवानी सी हो गई थी... हिवड़े में बसी हरिया की छवि निहारते-निहारते! कब से इन्तजार कर रही थी वह दीदी का.....और कौन था उसका जिसके साथ वह अपनी धड़कनों का संगीत सांझा कर सकती थी?
पशुओं का चारा भरा ट्रेक्टर आने पर वहीं तो जाती थी चारे का हिसाब-किताब रखने! पता नहीं कब चारे की गठरियां गिनते-गिनते वह अपनी धड़कनों को काबू में रखना भूल गई !
दीदी के ससुराल जाने के बाद गाय-बछड़ों को चारा देते-देते वह घंटों टक-टकी लगा हरिया को निहारती, उसका कोयलडी सा इन्तजार करती और उसके दीदार होते ही आम्रमंजरी सी महकने लगती! मन में तो खुशियों के लड्डू फ़ूटने लगते, भाव-लहरियां हिलोरें मारने लगती लेकिन न जाने क्यों, हरिया से गुफ्तगूं करते-करते अचानक खामोश हो जाती! चुपके-चुपके उसके लिए वह मकई का सोगरा और गुड़ अपनी थाली में से ले आती और उसे मनुहार कर खिलाती! दोनों मिल-बांट कर खाते और सपनों की रंगीन दुनिया में खो जाते! जब भी वह हरिया के करीब होती उसकी आंखों में उम्मीदों के जुगनू चमकने लगते!
दीदी से गले मिल उसे तसल्ली हुई, धाडस बंधा! दोनों बहने सोगरे का एक कौर लहसुन की चटनी के साथ लेती और ज्यादा तीखा होने की शिकायत करते-करते चट कर जाती! दोपहर तो बतियाने-हंसी-ठिठोली में बीत गई! रात बाजरी का खीस छांछ से खाने के बाद दोनों बहनें चांदनी रात में फिर बातों में लग गई! नींद तो मानों ठेंगा दिखा कब की भाग चूकी थी!
झमकू ने दीदी का दुपट्टा मुंह पर ओढ़, मुस्कुरा कर, दीदी को गुदगुदी करते हुए, जीजाजी के बारे में पुछ ही लिया! खुश तो हो न दीदी? बहुत प्यार करते हैं न जीजु आपको? फिर ये चेहरा उतरा-उतरा और पिला-पिला क्यों हैं दीदी? ये दुपट्टा भीगा-भीगा क्यों है दीदी?
दीदी आखिर कब तक उधार की हंसी ला भरमाती? दीदी की भीगी चुनरी का राज जानने को झमकू उतावली हो चुकी थी!
बोलो ना दीदी....दीदी...मेरी प्यारी दीदी!
हवा झोंके के साथ-साथ ही तेज होती चूल्हे की आग की तरह, दीदी के दर्द का ज्वालामुखी जागृत हो चूका था! वो फूट-फूट कर रोने लगी.... झमकू! अब सहा नहीं जाता! रात-दिन कम दहेज के लिए ताने, हम जानवरों से भी नहीं लेते... उतना दिन भर काम करवा लेते हैं.... एक पल ठहर कर सांस भी नहीं ले पाती हूं मैं ... और रात में जानवर सा व्यवहार....थारे शराबी जीजू की मार....हवस का कहर!
काश! माँ-बापूजी मुझे कुएं में धकेल देते... सारी जिंदगी मुझे कुंवारा रख देते...पर उन्हें तो बेटियों की शादी की पड़ी हैं न...
वह सुबक-सुबक कर रो रही थी!
झमकू को समझ नहीं आ रहा था वो करें तो क्या करें? माँ-बापूजी सुनेंगे तो...वो तो ऐसे ही मर जायेंगे...पर दीदी...वो कैसे रहेगी वहॉं .. दरिंदों की बस्ती में?
झमकू के दिलोंदिमाग से प्यार का भूत उतर चुका था ! शादी करके यह हाल? ऐसे होते है शादी के लड्डू? प्यार-व्यार समझती भी है यह बेदर्द दुनिया या दिल बहलाने के चोचले हैं सारे?
झमकू आसमान में तारों को निहार रही थी कि अचानक एक तारा टूटा...झमकू कराह उठी...दीदी! ये दुपट्टा जला कैसे?
कहीं ससुराल वालों ने तुम्हें स्वाहा: करने कोशिश तो नहीं की? दीदी! बोलो दीदी...
दीदी की खामोशी बहुत कुछ बोल रही थी! काश! माँ-बाबुजी जल्दबाजी न करते!
वह दीदी से लिपट गई! दीदी की पीठ पे जलती लकड़ी के निशान देख वह सिहर उठी! घर में जाकर हंडाई से पुराने घी का बना मलहम होले से दीदी की पीठ पर लगाया और पूनम के चांद को कोसने लगी!
दगाबाज! होले-होले दिखाते हो अपनी कलाएं, रोशनी भरे सपने और धकेल देते हो धुप्प अंधेरों में...
दोनों बहनें एक-दूजे को बाहों में भर रो रही थी और पास खड़ी रातरानी महक रही थी!
दीदी ने खुद को संभाला और झमकू को बाहों में भर होले से कान में कहा.... तुम्हें पसंद है न हरिया? अच्छा लड़का है! हमारे पास में ही रहता है...माँ-बापुजी को भी पसंद हैं...बढाए न आगे बात?
झमकू ने नन्हे बच्चे सा दीदी को बांहों में कस लिया! "दीदी! आप नहीं बदली! अपने जीवन की आँधी भी आपको डिगा नहीं पाई न? आप ही तो हो मेरे दिल की टोह लेने में माहिर!
दीदी! मैं आपको नहीं जाने दूंगी उस नरक में!"
न जाने कब तक चांदनी अपना नूर बिखेरती रही और चाँद मंद-मंद मुस्कुराता रहा!
लेखिका: कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई