स्वतंत्रता और एकता!
स्वतंत्रता और एकता 
 
विशाल वटवृक्ष की फैली चहूँऒर अनन्त डालियाँ,
वसुंधरा की ऒर बढ़ती जटाओं की झीणी ज़ालियाँ!
 
खुरदरे तने की आड़ में छुपा था शिकारी भेड़िया, 
शैतानी दिमाग़ का धनी फैला खड़ा था जाल नया!
 
बिखेरे जवार के दानें मानों धरा पर पानीदार मोती,
घने छायादार वृक्ष तले घात लगा बैठा था मर्मघाती!
 
परिंदों को ललचाने को काफ़ी थे अनाज के दाने!
'विनाश काले विपरीत बुद्धि' बुने विपदा के ताने-बाने!
 
'लालच बुरी बला है' युक्ति भूल परिंदे चुग रहे दाने,
टूट पड़े धान पर भूखे पंछी छल-कपट से अनजाने!
 
लालच की विषकन्या लील गई पक्षियों की आजादी,
फंस गए पंछी शिकारी के जाल में भूल नीली वादी! 
 
पँख फड़फड़ा छटपटा रहा युवा कबूतरों का झुण्ड!
बड़े-बूढ़े कसमसाएँ याद कर आहुति का यज्ञकुण्ड|
 
सलाखों पर सिर पटक-पटक कर पँख लुहूलुहान!
स्वतंत्रता के दीवाने अंधेरों में ढूंढ रहे अपना जहान!
 
कजरारे बादलों के बिच सौदामिनी देख झिलमिलाई,
बूढ़े परिंदे के अनुभवी बोलों ने आशा-ज्योती जलाई!
 
स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने शेर का जिगरा चाहिए,
आजादी का ध्वज थामने एकता-भाईचारा चाहिए!
 
मरता क्या न करता, बाबा ने बात पते की कही है,
जाल संग उड़ान भरों साथियों, नील गगन यहीं है!
 
स्वतंत्रता अनमोल, वज्र सी एकता रत्न-आभूषण है!
राष्ट्र-समर्पित सीमा-प्रहरी राष्ट्र का मान-सम्मान है!
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!
  • वाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!
  • बहुत खूब