मनु!
महामंगला छंद आधारित 
अष्ठकल + 111, अष्ठकल + 21

रच्चणहारे सकल, सृष्टि मातु के नाथ।
मिट्टी से कर सृजन, मनुज वरद मति साथ।
रिद्धि-सिद्धि पा अधिक, पगलाया मनु आज। 
अरिहंता बन अरिदल, करता दानव-काज।।

अहंकार मनु बहुत, पहने खुद ही ताज।
महाशक्ति बन जगत, खोले सब के राज।
हथियारों से महल, खड़े किएं हैं साठ।
चुन्धिया गएं नयन, देख यहाँ पर ठाठ।।

नहीं निभाते वचन, नहीं प्रजा सौगात।
सुन पैसे की खनक, भूल गएं औकात।
युद्ध-भूमि पर रुधिर, मलबा चारों ओर।
विभीषिका है कठिन, नहीं निशा की भोर।।

ऊपरवाला प्रबल, नहीं किसी का मीत।
दलदल में भी कमल, गया भरोसा जीत।
कर्म निर्जरा सतत, करना सब से प्रीत।
मानव पाई अकल, गा नित मंगल गीत।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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