अब वो रातरानी से महकते अहाते कहाँ? तेरे आगोश में सजती-सँवरती बातें कहाँ?
अब वो मोहब्बत में तर-बतर रातें कहाँ?
अब वो भँवरे की गुंजन वो बातें कहाँ?
ख्वायिशे दफन जिम्मेदारियों के मलबे तले!
गुम हुई चाशनी, रिश्तों में शिकवे-गिले!
नन्हीं कोंपलें लाई दाम्पत्य में दूरियाँ !
रिश्तों की बिखरी रेशम-लड़ियाँ!
उलझने उलझ कर बनी राह का रोढ़ा,
कहकहों ने ख़ामोशी का नक़ाब ओढ़ा!
आग उगलता पलाश चुराने लगा छाँव!
कोयल की बोली भी लगे काँव-काँव!
आईना डराने लगा उम्र की ढलान पर।
तीर न जाने कब चढ़ा कमान पर।
रिश्ते-नाते बने जब पैरों की जंजीरें!
मुल्लमा चढ़े आभूषण कैसे लगे खरे?
सुप्त ज्वालामुखी धधकता रहा दिल में!
बीते लम्हें तैरते रहे सूर्ख पात से ताल में!
शराबी अधरों पर मिश्री सी बातें कहाँ?
चांदनी में नहाई वो मदमस्त रातें कहाँ?
स्नेह के दीयों से जगमग मंज़िल कहाँ?
कहकहों की सितारों भरी महफ़िल कहाँ?
एक-दूजे में समाने का वो जज़्बा कहाँ?
बुलंदियों पें जुगनूओं का जमावड़ा कहाँ?
अब वो रातरानी से महकते अहाते कहाँ?
तेरे आगोश में सजती-सँवरती बातें कहाँ?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।