मेरे बचपन की यादें
✍️ कवि - विजय शर्मा एरी (Vijay Sharma Erry)
वो गलियाँ, वो चौपालें, वो मिट्टी की वो खुशबू,
नंगे पाँव दौड़ना, वो बारिश की ठंडी बूंदू।
कभी छत पर चढ़कर पतंग उड़ाना,
कभी नीचे आकर क्रिकेट का मैदान सजाना।
बल्ला टूटा, बॉल गुम हुई, फिर भी खेल न रुका,
दोस्ती थी सच्ची, न कोई शक, न कोई दिखावा झूठा।
शाम को जब सूरज छुपता,
हम सबका "छुपन-छुपाई" खेलता मन फिर चहकता।
कभी तुम जीते, कभी मैं हारा,
फिर भी न रहा मन में कोई किनारा।
कभी रूठे, तो पतंग की डोरी से मना लिया,
कभी कंचों की जंग में हार कर भी गले लगा लिया।
बैंडमिंटन की टूटी रैकेट, फिर भी मज़ा आता था,
खेल नहीं, वो तो जादू था, जो दिलों को साथ लाता था।
कभी माँ की डांट, कभी पापा की पुचकार,
पर उन दिनों का अलग ही था संसार।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
वो मासूमियत, वो मस्ती बहुत याद आती है।
वक़्त ने हम सबको आगे बढ़ा दिया,
पर दिल अब भी बचपन के आँगन में दौड़ता है।
अगर आपको भी अपने बचपन की कोई प्यारी सी याद आ रही है, तो कमेंट में ज़रूर लिखिए...
क्योंकि बचपन, फिर कभी लौटकर नहीं आता।
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