स्नेह-नेह! रात के बारा बजे फ़ोन की घंटी घनघना रही थी.. विचारों में डूबी कुसुम झट से उठ कर बैठ गई और अपना फ़ोन टटोलने लगी... फ़ोन सामने पड़ा था पर बावरी उसे यहाँ-वहाँ ढूंढ़ रही थी! प्रणव की आवाज़ से उसके ह्रदय को कुछ ठण्डक पहुँची ...
"हैप्पी दीवाली मम्मा... आय लव यू" मुश्किल से कुसुम ने 'सेम टू यू' कहा लेकिन उसकी थरथराती आवाज़ से प्रणव जान गया कि मम्मा उसे मिस कर रही है... वो समझ गया अगर उसने और कुछ पूछा तो वह रो पड़ेगी...प्रणव नहीं चाहता था कि आज दीवाली के दिन रोशनी की बारिश के बिच आंसुओं की बारिश हो... उसने गुड नाईट कह कर फ़ोन रख दिया|
कितनी पगली हूँ न मैं! जब फ़ोन आता है तब तो कुछ बोल नहीं पाती और जब वह काम में व्यस्त होता है, फ़ोन का इंतज़ार करती रहती हूँ! कुसुम मन ही मन खुद को कोस रही थी...
एकलौता बेटा..उच्चशिक्षा पाने चला तो गया अमेरिका पर चार साल हो गए अभी तक लौटा ही नहीं था मातृभूमि के आँगन में... प्रवासी परिंदे तो लौट आते है अपने देश पर यह बन्दा घरौंदा छोड़ उड़ तो गया पर वापस घर आने का नाम ही नहीं ले रहा! रोज झूठी तसल्ली... झूठे वादे...अब तो वहाँ की लड़की से शादी भी कर ली.. दोनों के मोटे-मोटे पैकेज...
कुसुम उम्मीद लगाएं बैठी थी अपनों के साथ दीवाली मनाने की... कितनी भाते है उसे मेरे हाथ के बेसन लड्डू, चकली, करंजी! प्रणव के पिताजी थे तब तक तो कुछ बना भी लेती थी मगर उनके जाने के बाद...सोचती.. प्रणव आएगा तो... न प्रणव आया.. न नाश्ते की यें स्वादिष्ट व्यंजन फिर बने...
कुसुम के मन में अँधेरा छा गया.. अमावस की रात.. लक्ष्मी जी का आने का समय... देहरी पर लक्ष्मी जी के पगलियां तो बना दिए थे उसने पर.. क्या करेगी वह लक्ष्मी जिसने उसके बेटे को उससे दूर कर दिया था! क्या महत्त्व रह गया था उसके लिए तीज-त्यौहार का? यें अपनों के बिना दीवाली.. यें कैसी दीवाली जहाँ दीये में स्नेह-नेह की नमी नहीं, प्रेम की बाती नहीं..कैसे प्रज्वलित करूँ दीप सूनी देहरी पर? कैसे होगी घर में रोशनी?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |









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