पर्व पर्युषण


पर्व पर्युषण में सखा, मिटे हृदय दुर्भावना।
कर्मो की हो निर्जरा, मोक्ष-मुक्ति आराधना।
जप-तप धार्मिक कार्य हो, धर्म-ध्यान सद्भावना।
मानव जीवन सार्थ हो, धारे भाव उपासना।।

क्षमा दान की याचना, धर्म-कर्म हो बंदगी।
जीव दया हिय भावना, पुण्य प्रभावी जिंदगी।
परम अहिंसा धर्म का, जयकारा प्रभु भक्ति का।
क्षमापना शुभ पर्व है, अंतस सम्यक मुक्ति का।। 

स्वरचित मौलिक रचना 
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।