पितृ-दिवस पर समर्पित रचना!
कौन कहता है, छोड़ गए हो, अजनबी जहाँ में!
बाप्पा! जिन्दा हो आप हमारे मन-मंदिर में! 
सृष्टि के ज़र्रे-ज़र्रे में !!

माँ की नम आँखों में, 
झलकता अक्स आपका!
घर के कोने-कोने से,  
प्रतिध्वनित होते शब्द आपके!
बगिया का गुलाब खिलता है, 
आपके स्नेह भरे आशीष से ! 
कामयाबी गूंजती है,
आपके ही आशियाने में !

कौन कहता है, मौत ने गले लगा, रुख़सत किया आपको ?

दिल के हर पन्नें पर,
सजधज खड़ी आपकी कविता!
जिंदगी के कुरुक्षेत्र में, 
अर्जुन हम, सारथी आप-विधाता!
धड़कन की लय पर,
बजे यादों का बाजा!
वक्त के सीने पर  जिन्दा ,
कुछ गहरे निशान ताजा!! 

कौन कहता है, जुदा हो अपने, यादों में ही रहते है?

चेहरे की  झुर्रियों से ,
आपका ही चित्र बनता है!
शब्दों के भूल-भुलैया से,
आपका मंजर उभरता है !
विचारों के आवर्तों से ,
आपकी सोच झलकती है !
विचारों की रेखाओं  से, 
छवि आपकी बनती है!

जिन्दा हो आप, फूल-पेड़-पत्तों में!
सूरज की किरणों में, चाँद सितारों में!
समंदर की गहराईयों में, नदियों की धाराओं में!
प्रकृति के हर अंचल में, माँ के धवल आँचल में!

बाप्पा! जिन्दा हो आप हमारे मन-मंदिर में! 
सृष्टि के ज़र्रे-ज़र्रे में !!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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