शीर्षक : परस्परोपग्रहो जीवानाम्'
'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' तत्वार्थ सूत्र सार,
सभी जीव निर्भर परस्पर यही धर्म आधार!
शिशु निर्भर माता पर बुजुर्ग आश्रित बच्चों पर!
बचपन आरुढ पीठ पर पचपन निर्भर मीत पर!
राष्ट्र का उज्जवल भविष्य निर्भर नौनिहालों पर,
भविष्य का उत्थान आश्रित नैतिकता संस्कारों पर!
नारी सशक्तिकरण की आधारशिला है आर्थिक स्वतंत्रता!
स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु समर्पण की है आवश्यकता!
स्वाभिमान, स्व-निर्भरता, स्वदेशी हैं राष्ट्र-शक्ति-प्रतीक!
आत्म-चिंतन, आत्म-बोध, आत्म- बल है पथ सटीक!
स्व-सुरक्षा हेतु क्यों निर्भर स्त्री दूसरों पर?
'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कलुषित दृष्टि क्यों बेटी पर?
नारी-अस्मिता-हरण रोकने न आयेंगे अब श्रीहरि!
स्वयं-सुरक्षा में स्व-निपुणता-निर्भरता है जरुरी!
राष्ट्र के नागरिक पर निर्भर राष्ट्र की सार्वभौमिकता!
राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण हो राष्ट्र का नीति-निर्माता!
बाज़ सी हो ऊँची उड़ान, चीते सी हो सजग दृष्टि,
आरम्भ हो शंख ध्वनि सा, समापन में हो अमृत-वृष्टि!
विश्व शांति हेतु श्वेत कबूतर नहीं अस्त्र-शस्त्र जरुरी!
परमाणु-शक्ति सम्पन्नता, आयुध-आत्मनिर्भरता जरुरी!
विश्व गुरु उपाधि हेतु आधि-व्याधि निवारक ज्ञान आवश्यक!
भारतीय संस्कृति, ज्ञान, अनुसन्धान में विश्वास आवश्यक!
निज देश, धर्म, गुरु, माता-पिता पर गर्व यथोचित,
सदैव जागृत हो स्वाभिमान, स्व-सम्मान उचित!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई