ये रिश्ता क्या कहलाता है
शीर्षक : ये रिश्ता क्या कहलाता है?
 
गुजरे हुए सालों ने रिश्तों के ताने-बाने को उधेड़ कर रख दिया था! कौन अपना, कौन पराया? महामारी ने गर्दन क्या मरोड़ी, रिश्तों पर से सोने का मुलम्मा हट गया, खोटा सिक्का बेनकाब हो गया! वक़्त ने करवट क्या बदली, दुनिया की भीड में हम अकेले पड़ गए!
भरा-पूरा परिवार! आंखों के सामने अथांग फैला समंदर, फिर भी प्यासे के प्यासे! सब घरों में कैद लेकिन सब आशंकीत!
"उम्र की ढलान पर हैं जो उनके लिए क्यों जोखिम उठाएं? कौन बचाएगा हमें? न बाबा न! अपना सोचो! इन्होंने तो जी ली अपनी जिंदगी! क्यों बेकार में खुद को दांव पर लगाएं?" ये अपने ही थे जिनकी सोच बदलते मौसम सी बदल चुकी थी!
रच्चणहारे का कमाल था कि अपने पराए हो चूके थे और पराएं रिश्तों की नमी का एहसास करा रहे थे!
इन्सान घरों में कैद, पशु मुक्त-स्वच्छंद! सब आशंकीत, भयभीत... अपनों से, सगे संबंधियों से, मित्रों से! क्यों बेकार में खुद को दांव पर लगाएं?" ये अपने ही थे जो वक़्त की जरासी आंधी में जड़ से जुदा हो चूके थे! अपने पराए हो चूके थे और पराए रिश्तों की नमी का एहसास करा रहे थे!
तमाम आशंकाओं के बावजूद दुधवाला रोज दुध देने आ जाता! कभी-कभार पुलिस को जवाब देते-देते देर भी हो जाती थी उसे पर आता जरुर! फोन करती तो फल-सब्जियां, दवाइयां, परचुन भी पहुंच जाता घर पर!
मैं अक्सर सोचती," क्या इन्हें डर नहीं लगता मौत से?"
एक दिन पुछ ही लिया मैंने! "भय्या! आप को डर नहीं सताता बीमारी का?" वह बोल पड़ा मानों मेंने उसकी दुखती नस पर हाथ रख दिया हो! "मैडम जी! हम घर पर बैठ जायेंगे तो भूख से मर जायेंगे! बिना मेहनत- मुशक्कत कौन देगा हमें रोटी? रोज की कमाई पें पेट पलता हमारा! फिर गांव में बुढ़े मां-बाबूजी  हैं, बीबी, बच्चे भी हैं...मैडम जी! आपको भी कुछ काम हो तो हमें जरुर बताइयेगा!"
शायद आनेवाले तुफ़ान की चेतावनी थी रच्चणहारे की ! दूसरे ही दिन बेसीन का पाईप टूट गया...घर में पानी-पानी.. आंखों में पानी-पानी! करुं तो क्या करुं? कहां से लाए लाकडाऊन में नया पाईप और प्लम्बर?
अचानक दुधवाले की बात याद आ गई! बस!कहने की खोटी थी! दूसरे ही दिन वह पाइप लेकर हाजिर!"मैडम जी! पड़ोस में मेरे दोस्त का दुकान-घर साथ-साथ हैं, उससे मांग कर लाया हूं! बताइए! कहां लगाना हैं? मैं लगा देता हूं!" मन ही मन मैंने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया!
ऊपरवाला भी एक खिड़की बंद करता हैं तो दूसरी खोल भी देता हैं! मैंने जबरदस्ती उसके हाथ में सौ की नोट ठूंस दी और खूब आशीष दिए! 
दुनिया भी कैसी रंग-रंगीली हैं! जिनसे उम्मीद होती हैं वो खरे नहीं उतरते और जिनकी कल्पना भी नहीं कर सकते वो नैया पार लगा देते हैं! 
दो-तीन दिन से मैं फलवाले को फोन लगा रही थी पर वह उठा ही नहीं रहा था! मुझे लगा शायद यह भी कन्नी कांट रहा है! नहीं.. नहीं! कितनी मिठास थी उसकी जुबान में! मद्रासी था इसलिए  मैं उसे अण्णा कहती! मेरा ननिहाल था न मद्रास(चेन्नई)! जब भी मैं उससे मेरी 'टूटी-फूटी' तमिल में बात करती, वह बहुत खुश हो जाता! पास खड़े ‌‌बच्चे को बुला कर कहता..जा..मैडम के लिए रिक्शा ले कर आ...मैडम जी! रुकिए! बडी थैली देता हूं आपको..आपका सारा सामान आराम से आ जाएगा इसमें! न जाने क्या रिश्ता था उससे! मुझे देख कर उसकी आंखें चमक उठती! मेरे मन में आशंका के घने बादल अपना डेरा जमाने लगे! २०-२५ सालों से जान पहचान थी उसे! आखिर क्यों फोन नहीं उठा रहा? कही बाकी रिश्तेदारों की तरह वो भी ...
खैर!
अब दवाइयां खत्म होने को थी! पड़ोस की दुकान से ही मंगवाती थी मैं! हमारे पुराने परचून के दुकानवाले ने ही दवाई की दुकान खोल दी थी.. बच्चे ने 'डी फार्म' की डिग्री  जो ली थी!
वो अक्सर कहता," आंटी जी! अच्छा हैं आप 'अक्टीव' रहती हो! आजकल तो हर घर में जितना किराणा नहीं जाता महीने का उससे ज्यादा तो घरों में दवाइयां जाती हैं! यह तो अच्छा हैं आप 'चलता पूर्जा' हैं बाकि तो... मैं मुस्कुराती और कहती... "पुरानी खिलाडन हूं बेटा! गांव की हवा में बड़ी हुई हूं...देसी चीज़ें खा-खा कर...वो भी मुस्कुराता और सामान बांधने में लग जाता!

बहुत दिनों बाद कल नया सलवार सूट सिलाई के लिए देने चली गई थी! देखते ही 'मास्टर' मुस्कुराने लगा! "मैडम जी! अच्छा लग रहा हैं न अब! 'मास्क' नहीं...शक्ल भी बराबर दिखाई दे रही हैं न सबकी!" मैं मुस्कुराई!
यहीं तो सब हैं मेरे असली रिश्तेदार!
कपड़े दे कर मैं आगे बढने लगी! तभी किसी ने आवाज लगाई!" कैसी हैं मैडम जी! मैंने मुड़ कर देखा! सब्जीवाला कह रहा था,"मैडम जी! ठिक हैं न आप! सब्जी नहीं चाहिए..कोई बात नहीं! आपको देख कर अच्छा लगा!"
मैं आगे बढ़ रही थी! मैंने मन बना लिया था.. मैं फलवाले से बिल्कुल बात नहीं करुंगी...फिर भी.. सालों पुरानी आदत जाते-जाते जाएगी न...मेरी नज़र फलवाले के खोमचे की तरफ गई...
यह क्या! सब ढक कर रक्खा हुआ क्यों है?
मन में अनहोनी ने दस्तक दी.. मैंने पास में खड़े छोटू को आवाज दी.."अण्णा किधर है छोटु? फोन भी नहीं उठाता..."
"मैडम जी! कैसे उठाएगा? उसकी तो कोरोना में डेथ हो गई.. बहुत पीता था न! पल भर के लिए मेरी आंखों के सामने सोने से लदी, सांवली, चेहरे पर हल्दी की चमक वाली, सहजन की फल्ली सी उसकी पत्नी आ गई! छोटी सी उम्र... छोटे-छोटे बच्चे! पल भर लगा...मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई हैं... मैं अवाक देखती रह गई और पत्थर की मुरत सी सुन्न हो घर की ओर लौटने लगी खाली थैलियों के साथ! आज कोई नहीं था जो आवाज़ दे कर रिक्शा रोकने के लिए कहता... या कहता...आपके लिए बड़े-बड़े मद्रासी केले निकाल कर रख्खे हैं मैडम जी! देखो! ये मद्रासी 'मुरका'(चकली) भी आई है...और यह सांबार मसाला...ये उकड़ा चावल का पैकेट दे दूं न....मैडम जी! कल ही वो आंटी...वो आपकी...बस! फिज़ा में एक सन्नाटा था...कभी न टूटने वाला सन्नाटा....

 
 
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