कब तक....
शीर्षक: कब तक.....
 
कब तक मन का दर्द मन में छुपाते?
पलकों की देहरी पर आँसू रोक पाते?
छलकता जाम पराई नज़रों से बचाते?
सुलगता ज्वालामुखी थपकियाँ दे सुलाते?
भीगे नयनों की भीगी कोरों को सुखाते?
अश्कों की लड़ियों को बिखरने से बचाते?
तेरी बेवफाइयां जज़्ब कर जी पाते?
 
फलक पर चितेरा था उम्मीदों का मंजर,
क्यों हस्ताक्षर कर छुप गए अंधेरों में!
चुनर लहराई थी हमने नीले आसमां में,
क्यों दागदार दामन अश्क़ के सैलाब में?
नाम के साथ नाम जोड़ पाएं न कभी,
सिर्फ बदनाम नाम कर गए जहाँ में!
जिसे प्यार समझ बैठे थे हम बेवफ़ा,
वो प्यार था या ज़िस्म का फलसफ़ा ?
 
भले चाँद-सितारें न तोड़ लाते,
दिल में जरासी ठौर दे जाते!
भले अधरों को चूम न ठंडक पहुँचाते,
लफ्जों से ज़ख्मो पर मरहम लगाते!
भले दुनिया के सामने न हाथ थाम लेते,
सीने पे सिर रख धाड़स तो बंधाते!
भले ज़िन्दगी में न हमसफ़र बन पाते,
दोस्ती की अदना शर्त तो निभाते! 
कब तक घुट-घुट जीते अकेले?
तन्हाईयों में लगते हो यादों के मेले!
कब तक साहिल पर इंतज़ार करते,
मंझधार में हिचकोले खाती कश्ती को ठेले?
कब तक भ्रम-जाल में फँसते-फँसाते,
खंडहर सी ज़िन्दगी का बोझ पेले?
ज़िन्दगी बन गई जब अनसुलझी पहेली,
कब तक मन का दर्द मन में छुपाते?
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
 
 
 
 
 
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • आप से जुड़ कर, कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!🙏❤️🙏❤️🙏