शिशु!
माँ के हाथ का झुनझुना,
शिशु को कहाँ लुभाता है?
ग्याझेट्स का रंगीन जमाना,
लाडले को बहु भाता है।

सुन मोबाइल की घंटी,
नव-पल्लव खिल जाता है।
बिखेर हँसी खूब  बंटी,
खींच मोबाइल ले आता है।।

माँ के हाथ का मिष्टी दोना,
भरा-भरा रह जाता है।
मोबाइल नहीं भोजन संग,
मुन्ना बगावत पें उतरता है।।

खतरनाक किरणों से,
डर कहाँ लगता शिशु को?
अनजाने में भोला बालक,
घबराता नित अँधियारा से।।

खेल-खिलौने बेशक़,
शिशु की सुन्दर सी दुनिया।
लौरियाँ सुन सोने के विपरीत,
मोबाइल के लिए रोता है।।

छीना-झपटी में नौनिहाल,
भूल गया मासूम बचपन।
वक़्त से पहले ही किसलय,
भूला देखो अब लड़कपन।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



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