2 819 2 819 शिशु! माँ के हाथ का झुनझुना,शिशु को कहाँ लुभाता है?ग्याझेट्स का रंगीन जमाना,लाडले को बहु भाता है।सुन मोबाइल की घंटी,नव-पल्लव खिल जाता है।बिखेर हँसी खूब बंटी,खींच मोबाइल ले आता है।।माँ के हाथ का मिष्टी दोना,भरा-भरा रह जाता है।मोबाइल नहीं भोजन संग,मुन्ना बगावत पें उतरता है।।खतरनाक किरणों से,डर कहाँ लगता शिशु को?अनजाने में भोला बालक,घबराता नित अँधियारा से।।खेल-खिलौने बेशक़,शिशु की सुन्दर सी दुनिया।लौरियाँ सुन सोने के विपरीत,मोबाइल के लिए रोता है।।छीना-झपटी में नौनिहाल,भूल गया मासूम बचपन।वक़्त से पहले ही किसलय,भूला देखो अब लड़कपन।।स्वरचित तथा मौलिक,कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई। Label Directed by द्वारा कुसुम सुराणा Shared14 May 2026 Start 14 May 2026 End 14 May 2027 The Critic’s Corner इस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें शिशु! © टिप्पणी 400 characters remaining जमा करें रद्द करें