चौपाई छन्द में प्रस्तुति :
शीर्षक : त्रिपुरारी!
बदरी काली घिर-घिर आई,
कजरी गाएं लोग-लुगाई,
बूंद-बूंद भर गगरी लाई,
वन-उपवन हैं रंगत छाई।
सूरजमुखी लड़ाएं नैना,
तारों से सज आई रैना,
ढ़ोल-मंजिरा, मृदंग बाजे,
मुरली श्रीहरि मुख में साजे।
रंग बसन्ती देखो छाया,
धरती ने आँचल लहराया।
कानन-कानन जश्न मनाया,
रोम-रोम पुलकित हो पाया।
घोल सृष्टि में अमिरस-हाला,
शिव ने पिया जहर का प्याला।
भस्म लगा तन शंकर भोले,
सुख-सुविधा के ताले खोले।
'हर-हर महादेव' का नारा,
हरता पीड़ा तारण हारा।
भोला डमरू, त्रिशूल धारी
खल संहारक शिव त्रिपुरारी।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र।