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ये इश्क़ हाय...जीने देता है न मरने देता है...कंबख्त! होले से दस्तक देता है,
दिल के दरवाजे पर, लूट कर रफूचक्कर हो जाता है....रातों की नींद, दिल का सुकून-चैन!
ख्वाहिशें बहुत हैं, लफ्ज़ तन्हा-तन्हा ,
हर पल गुजरें तेरी बांहों में, यही तमन्ना!
उम्मीदों के महल, रेत के आशियाने,
कब ढह जायेंगे, कौन जाने!
ये इश्क़ कंबख्त़, खुदा की नेमत है!
आसान नहीं ये खुदा...
तेरे नूर का दीदार करना!
इश्क में तेरे सब कुछ लुटा के फ़ना होना...
नदियों का समंदर में अस्तित्व खो देना!
मिटा के अपनी हस्ती,
रुह का रुह में समा लेना!
इश्क़ हैं मिट कर भी जिन्दा रहने का हुनर,
जहर ज़िन्दगी का पीकर भी मुस्कुराने का जिगर..
समर्पण बाद भी अंतिम नहीं एकाकी डगर...
सफ़र हैं कई भवों का, जाना अकेले ही मगर!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |