ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५१
भाग ५१

अभी-अभी नहा कर आई विभा का रूप देख कोई भी मोहित हो जाता मानों काली-काली केश-लतिकाओं के बीच खिला सोनचंपा का फूल! समय की पाबंद विभा झटपट तैयार हो गई। सभी आठ बजने के पहले ही स्वागत कक्ष में हाजिर हो गई थी। यश और वज्र सोफा पर विराजमान थे... अदा ऐसी मानों कोई हाथी की अंबारी में बैठा राजकुमार!

विभा को देखते ही यश बोल पड़ा, " मेरी प्यारी भूतनी! रात को सोई भी थी या पीपल के पेड़ पर बैठ जादू-टोना कर रही थी" 
विभा भी हँसने लगी और बोल पड़ी, " अरे यार! कैसे सोती? मेरा मित्र 'भूतों का महाराजा' सोने दे तब न! बार-बार एक ही बात पूछ रहा था, " माय लव! विल यू म्यारी मी? " सभी हँसने लगे! यश बीच में ही बोल पड़ा, " वाह! वाह!! क्या कहने! इक्कीस्वी सदी का मॉडर्न भूत था यार! अंग्रेजी में प्रपोज़ करता हैं अपनी वैलेंटाइन को!" अब की बार मानों पूरा स्वागत कक्ष गूंज उठा उनकी हँसी से! 
वज्र बोल पड़ा, " दीवानों!  'वैलेंटाइन डे' बाद में मनाएंगे! चलों! पहले पेट पूजा कर लेते हैं! चाय के बिना गाड़ी चलती नहीं यार" 
सभी चल पड़े कैंपस कैंटीन की ऒर! 
कैंपस का कैंटीन भी बहुत ही उम्दा बना हुआ, साफ़- सुथरा और कलात्मक तरीके से सजाया हुआ था! दीवारों पर ग्रामीण भारत की तस्वीरें थी जिसमें कहीं कोई गौमाता को दुह कर अमृत घट भर रहा था तो कहीं कोई मालन सिर पर सब्जी से भरी टोकरी उठा, अपना छप्पन कलियों का घाघरा संभालती-संभालती जा रही हैं। बीच-बीच में कहीं व्यंजनों के चित्र हैं तो कहीं फलों के रस से भरे मग तो कहीं आम के मिल्क शेक का जाम! गज़ब की साज-सज्जा! यहाँ तो दीवारे ही बोल रही थी।

सभी ने हल्का नाश्ता किया और निकल पड़े टहलने के लिए! कैंपस के एक तरफ बोटॅनिकल गार्डन था! कई तरह की औषधिय वनस्पतियों के नामपट्ट लगे हुएँ थे, उस पर उनके वैज्ञानिक नाम और संक्षिप्त जानकारी भी लिखी हुई थी! हरी-भरी वसुंधरा को देख मन पुलकित हो रहा था। किसी का भी वहाँ से निकलने का मन नहीं हो रहा था लेकिन सब के लिए मुख्य कार्यक्रम में समय पर उपस्थित होना जरुरी थी और उस के लिए तैयार होना बाकी था। कुछ समय उपवन में चहलकदमी कर सभी अपने गेस्ट हाउस की तरफ बढ़े।  

तीनों महिलाओं को गेस्ट हाउस के बाहर छोड़ वज्र और यश स्वयं भी तैयार होने चल पड़े। कार्यक्रम ग्यारह बजे शुरू होनेवाला था लेकिन कुछ औपचारिकता पूरी करने के लिए सभी ने सव्वा दस बजे स्वागत कक्ष में मिलना तय किया और दोनों अपने-अपने अल्पकालीन आशियाने की तरफ चल पड़े। 

सभी ने अपने पहचान पत्र साथ में ही रक्खे थे...न जानें कब उनकी जरुरत पड़े! विभा, वैदेही और जानकी जी ने आज साड़ी पहनने का मन बना लिया था! जानकी जी ने बालों का जुड़ा बना लिया तो विभा और वैदेही ने अपनी नागिन सी डोलती लटों को खुल्ला ही छोड़ रक्खा था हवा के साथ-साथ अटखेलियां करने के लिएँ। वैदेही ने दोनों तरफ से एक-एक लट को पीछे की ऒर मोड़ कर उसे जोड़ कर क्लीप लगा दिया था। काली-काली घूँघराली लटों को बीच हीरे सा चमकता वह तितलीनुमा क्लिप वैदेही के व्यक्तित्व को और निखार रहा था! वैदेही ने माँ ने दी हुई पैठनी साड़ी पहनी थी। हल्के मोरपँखी रंग की साड़ी, सुन्दर पल्लू और किनारी से सजी! साड़ी पर जगह-जगह नाचते रंगबिरंगी मोर और साड़ी से ही निकाला हुआ सुन्दर मैचिंग ब्लॉउज! वैदेही की संगमरमरी काया पर मोरपँखी रंग बहुत फब रहा था मानों उपवन में अपनी ही धुन में नाचता मोर! कानों की लम्बी-लम्बी बालियाँ और गले में नीलम से सजा हार ! वैदेही का श्रुँगार देख कोई भी उस पर मोहित हो जाता तो दोष उसका नहीं, वैदेही के लावण्य और गरिमा का होगा यह अकाट्य सत्य प्रतीत हो रहा था! 

जानकी जी उसकी तरफ ऐसे देख रही थी मानों वह सम्मोहित हो गई हो! उनका मन कर रहा था बचपन में जैसे वह उसे नजरबट्टू टीका लगाती थी वैसे ही आज भी लगाएं लेकिन अब वैदेही बच्ची थोड़े ही थी? वह तो अब लावण्यवती शोडषि नज़र आ रही थी। 

यादें भी उन परिंदों की तरह होती हैं जो आसमान में उड़ान भरते-भरते न जाने कब आ कर किसी पेड़ पर ठहर जाते हैं, विश्राम करते हैं, हवा के साथ-साथ डोलती डालियों से निकलती मंद-मंद स्वर-लहरियों को सुनने में व्यस्त हो जाते हैं ! जानकी जी फिर अतीत के सरवर में डुबकियाँ लगाने लगी। झील की सतह पर कई नील कमल मुस्कुरा रहे थे और जानकी जी उन्हें निहार रही थी। यह साड़ी उन्हें श्री ने मधुचन्द्रमा की रात को उपहार स्वरुप दी थी। यह रात उनके प्रणय बन्धन तथा अद्भुत, अकल्पनीय मिलन की अनुपम रात थी। 
विभा की आवाज़ से जानकी जी फिर यथार्थ की दुनिया में लौट आई।

वक़्त भी अजीब शख्स हैं! खुद ही घाँव देता हैं और खुद ही उसे भरने की कोशिश में लगा रहता हैं। कुछ तो भर जाते हैं लेकिन कुछ बीते वक़्त के साथ-साथ और गहरे होते जाते हैं क्योंकि जिन यादों को हम भूलना चाहते हैं उन्हें हम कभी भूल ही नहीं पाते! शायद विस्मृति का वरदान उनके नसीब में होता ही नहीं हैं! हर पल, हर जगह वह यादें नन्हें अंकुर सी धरती के आँचल से मुँह बाहर निकाल टुकुर-टुकुर देखती हैं और अपना अस्तित्व जताती  रहती हैं।

जानकी जी ने हल्की गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी पहनी थी। उनका चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था मानों वह श्री को दिया वचन निभा रही हो! असमय सफेद हुए बालों के बीच भी उनका व्यक्तित्व सादगी और गरिमा से चमक रहा था। उन्होंने पर्स को भी एक बार चेक किया और विभा की ऒर देखने लगी! विभा की नटखट, चंचल हँसी उन्हें बहुत भाती थी। जब वह उससे मिलती, उन्हें ऐसे लगता मानों वसंत का आगमन हो गया हैं! सूर्य की तपिश भी थी उसमें और वसंत की निश्चल, मासूम हँसी भी! मानों सारे इर्दगिर्द के महानुभावों को खुशियाँ बाँटने का ठेका इसी ने ले रक्खा हो!

विभा ने गहरे लाल रंग की बांधनी पहनी थी जो पद्मावती जी जयपुर से ले आई थी। बांधनी, पैठनी ये कभी फैशन बाज़ार से 'आउट' नहीं होती। भारतीय महिलाओं को इनसे जबरदस्त लगाव हैं। कोई भी शुभ कार्य इनके बिना सम्पन्न कहाँ होता हैं? 
गेहूं के चमकते दाने सा विभा का चेहरा सुवर्ण आभा फैला रहा था। लाल रंग की पृष्ठभूमि पर जरी-रेशम से सजे फूल-पत्तों की कशीदाकारी अनायास ही सबका ध्यान आकर्षित कर रही थी। नपा-तुला शरीर, लम्बी-घनी केश राशि, निर्मल मन और बेमिसाल मुस्कुराहट ही विभा की पूंजी थी! एक हाथ में ब्रेसलेट, दूसरे में टाइटन की 'रागा' घड़ी, कानों में नन्हें-नन्हें झुमके और गले में हीरे का हार! विभा और वैदेही लक्ष्मी-सरस्वती की जोड़ी लग रही थी! वक़्त बदल चूका था! आज दोनों बहने भले ही स्वभाव से भिन्न-भिन्न थी लेकिन हाथ में हाथ डाल चल रही थी, आगे बढ़ रही थी।
अब सिर्फ चेहरे का श्रुँगार ही बाकी था। विभा एक खिलाडिन थी। उसे मेकअप का बिल्कुल शौक नहीं था। वैदेही का भी यही मिजाज़ था। दोनों ने हल्का सा पाउडर लगाया और बिंदी लगा कर तीनों स्वागत कक्ष में पहुँच गई। वैदेही ने साथ में निमंत्रण पत्र तथा भाषण लिखा परचा भी लिया था। पर्स, जूते सभी मैचिंग। 

तीनों सोफा पर बैठ गई। तभी सामने से यश और वज्र आते दिखाई दिएँ। वज्र ने कुर्ता पायजामा पहना था तो यश ने पठानी सूट! दोनों की अपने-अपने व्यक्तित्व के अनुसार वेशभूषा थी! यश के सिक्स पैक एब्स वाली काया थी तो वज्र सामान्य, छरहरी कद-कांठी वाला! यश गेहूँआ वर्ण वाला तो वज्र गोरा-चिट्टा! वज्र ने हल्के पिस्ता रंग का लख़नवी कशीदाकारी वाला कुर्ता और सफेद पायजामा पहना था तो यश ने दूधिया रंग का पठानी सूट! दोनों का व्यक्तित्व इतना प्रभावी था कि जहाँ से भी गुजरें, सबका ध्यान एक बार तो जरूर आकर्षित करेंगे! सभी ऐसे तैयार हुए थे मानों घर में कोई मंगल कार्य हो रहा हो!

सभी के चेहरे सुनहरे भविष्य के स्वागत को आतुर थे। सभी वैदेही के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर खड़े थे। 
मित्र-मण्डली और जानकी जी उस स्वर्णिम पल का इंतज़ार कर रहे थे जब विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के प्रधानमंत्री जी वैदेही का सम्मान करेंगे और वैदेही अपने मन के विचारों को सब के साथ साझा करेगी! 
इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण भी होनेवाला था। मित्र मण्डली ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को भी इस बात की जानकारी दे दी थी ताकि वे अपने स्थान पर बैठ कर भी इस कार्यक्रम को देख सकें और अपने परिजनों की उपस्थिति को महसूस कर सकें! 

सभी हॉल में पहुँच चुके थे। ऊँचे-ऊँचे स्तम्भ, दीवारों पर लगी सुन्दर कलकृतियाँ और छत से लटकते-झूलते, रोशनी बिखेरते झूमर देख सभी अभिभूत थे। कार्यक्रम को शुरू होने में दस मिनट बाकी थे। वज्र , वैदेही तथा जानकी जी की सीट मंच की प्रथम पंक्ति में आरक्षित थी। उन्हें दिए गएँ पास पर अंकित अंक के हिसाब से ही बैठना अनिवार्य था। सभी को माननीय प्रधानमंत्री जी का इंतज़ार था...मंच को फूलों से सजाया गया था और पीछे 'युवा स्पंदन' कार्यक्रम का बैनर लगा था। सबकी नजरें द्वार पर टिकी थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • खूबसूरत प्रस्तुति
  • बोहोत अछा पोस्ट है |
  • बहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏