जैन धर्म के परम प्रवर्तक, प्रथम तीर्थंकर, त्यागी, वितरागी परम तपस्वी परमेश्वर सिद्ध अरिहंत,
योगी, भगवान आदिनाथ जी की, गुणगाथा व उस अद्भुत अलौकिक आत्मा एवं उस अलौकिक काल की स्तिथियाॅं, श्रमण धर्म की स्थापना व भगवान आदि देव अरिहंत ने कैसे अपना जीवन यापन किया, कैसे सिद्धियां प्राप्त की,
भव भ्रमण यानी संसार सागर के चक्र से उन्हे कैसे मुक्ति मिली ,
उस पर मंथन कर गुंथन करने की मुझ अकिंचन की कोशिश ताटंक छंद में...
मैंने आम जिज्ञासु की तरह मुझ ही से,मैंने प्रश्न किये,मेरी अल्प मति व मेरी जो भी सतही जानकारी, मेरी धर्मानुरागी माॅं स्वर्गिय तारा देवी से प्राप्त हुई थी , उनके दिव्य आशीष से प्रयास किया मेरे भावों को शब्दों में संजोने का उसे गाने का।
हालांकि मैं इस काबिल नहीं हूॅं कि उस अलौकिक आत्मा व अरिहंत भगवन् के बारे में कुछ लिख सकूं। नहीं मेरी आवाज़ में वो देवत्व वो सत्व व तत्व है , फिर भी प्रयास करने की जुर्रत की है ।
यह मेरा छोटा सा कवित्व मेरे लेखन प्रयास
व मेरे अभ्यास का हिस्सा है , मुझे क्षमा करें मेरे छंद में कहीं कोई त्रुटियां हो तो,बेझिझक मेरा मार्गदर्शन करें।
तो प्रस्तुत है मेरी रचना