"वो वंदनीय हुए युगों तक "...
जैन धर्म के २२ वें तीर्थकर अहिंसा उपासक परम चिंतक, परम ध्यानी, केवल ज्ञानी, भगवान कृष्ण के चचेरे भाई और रहनेमी के सगे भाई भगवान नेमीनाथ जी माता शीला देवी व पिता समुद्रविजय थे ।
नेमीनाथ जी तरुणावस्था में राजा उग्रसेन की पुत्री राजुल से शादी करने गये थे,
हालांकि इस वैरागी जीव को कृष्ण भार्या नेमजी की भाभी रुक्मणी व सत्यभामा ने बड़ी मुश्किल से शादी के लिए मनाया था , पर ससुराल बारात लेकर गये तो देखा वहां भोजन के प्रबंध लिए बंद किये पशुओं का झुंड़ आक्रंद व क्रंदन कर रहा था ।
यह सुनकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ और सारथी से तुरन्त रथ मुडवाया और संयम मतलब दीक्षा ग्रहण करने की ठान ली थी,
वे गिरनार गये आत्मा का उत्थान कर परम तीर्थंकर हमारे अरिहंत बन गये।
हमारे प्रेरक हमारे मार्गदर्शक हमारे भगवान नेमीनाथ की गुणगान उनके जीवन पर प्रकाश डालने का छोटा सा प्रयास किया मेरी साधारण कलम का उपयोग कर । मां सरस्वती को आह्वान करते हुए...
नमन करें हम मातु शारदे,
कृपा जरा तू बरसाना।
लिखु छंद मैं नेमीनाथ पर,
जरा मुझ पे तरस खाना
शब्द हुआ इधर उधर कोई,
माफ़ी मुझको दे देना।
माॅं मेरी तुम हो दयालु ,
चरणों में तुम लें लेना।।
अकिंचन काव्य मैं कलम कार,
लघु लेखक अदना सा मैं
कैसे लिखु वो विशुद्ध रुप से
नेम सजदा कसीदा मैं ।।
बचपन में सुनी नेमावली
माॅं ने मुझे सुनायी जो
उस मानक पे ही लिखने की
हिम्मत जरा जुटायी वो
परिचय प्रभु नेम नाथ का ,
परम ज्ञान के ज्ञाता थे
परम तिर्थंकर नेम प्रभु जी
चरम दयालु दाता थे
"वो वंदनीय हुए युगों तक "
किशन जी के चचेरे थे ।
वैरागी प्रभु नेम नाथ जी ,
प्रभु शिवा सुत बड़ेरे थे।।
समुद्र वीजय तात थे उनके,
रहनेमी लघु भ्राता था,
शौर्य पुरी में प्रभुजी जन्में ,
यादव कुल से नाता था।।
छोड़ी संसारी माया को,
वे चिंतक सुविचारी थे।
करके निश्चय मन मोड़ लिया,
अरिहंता अविकारी थे।।
मंगनी हुई थी राजुल से ,
सुता उग्रसेन की प्यारी ।
जोड़ी थी वो ऐसी सुंदर ,
अदभुत वो नोखी न्यारी।।
बारात सजी तय शादी की,
रथ तोरण तक भी आया ।
सुना था पशुओं का पुकारा,
मन भर कर उनका आया ।।
फूटा झरना अनुकंपा का,
बदले मन नेमी राजा ।
करवा दिया बंद उसी समय,
शादी का गाजा बाजा।।
ये झूठी संसारी माया,
ये अनुभव पहले से था।
कारण बना ये तोरण द्वार,
नहले पे दहले सा था।।
मोड़ लिया रथ की चाकी को,
पकड़ा पथ मंगल कारी ।
ऊंचे शिखरे ऊंची आत्मा,
संत बने वे गिरनारी।।
उधर राजुल रोती बिलखती
दिग्मुढ होके बैठी थी
हुआ क्रंदन आक्रंद उस पल
दर्द दुखारी वेठी थी
तोड़े लिये नेम क्यों ये रिश्ता
नेह प्रीती पुरानी थी
कोई अपराध हुआ मुझसे
पुछी राजुल सयानी थी ।।
करवा ज्ञान भान राजुल को
नम्रता से समझाया था।
समझायी असारता जग की
ज्ञान दीप दिखलाया था
बोध दिया दुल्हन राजुल को,
चली थी नेम कदमों पे वे।
हुआ लोप विवाहतुरता का ,
उभरी थी सदमों से वे।।
लिया संयम बने तिर्थंकर,
अहिंसक सदाचारी थे।
वे जीव रक्षक परम कृपालु
प्रभु बाल ब्रह्मचारी थे।।
किया उद्धार निज आत्मा का ,
बने पूज्नीय नेमीनाथा।
गाते अनुयायी हम जैनी,
महिमा गुण उनकी गाथा।।
कोशिश की हैं मैंने थोड़ी ,
पुण्य थोड़ा कमा लूं मैं ।
सोचा मैंने नेमी प्रभु पर ,
छंद कोई बना लूं मैं
स्वरचित:अशोक दोशी