दोहे! आगे तीतर हैं चले, पीछे देख बटेर|
बना धरा पर घोंसला, पर हैं चला बिखेर ||

पवन करें अठखेलियां, घन कजरारे मौन|
सजल नयन वर्षाव को, रोक सकेगा कौन?

निकली तीतर ढूंढने, तब कर लगत बटेर |
देखें सपन सजल नयन, नियती करती फेर ||

रामायण लिख वाल्मिकी, पाई जग में ख्याति|
महाकाव्य का हैं जनक, वाल्या कोली न्याति||

दम्भ महाभारत रचे, ज्ञानी मानव चेत,
पांचाली अवमानना, महा युद्ध संकेत ||

सिर भुजंग फन हैं सजा, पार्श्व नाथ हैं देव |
पर उपकारी प्रभु सरल, नाव पार दे खेव ||

ले त्रिशूल हर शूल माँ, कर दे बेडा पार |
घर-घर पल-पल हैं बढ़े, सर्प जहर आगार ||

आँखों से क़ानून के, पट्टी छूटी आज |
न्याय देवता कर रहे, मीन-मेख बिन काज ||

अपराधी का हौसला, बढ़ा रहें कानून |
पीड़ित हैं घर में छुपा, मुरझा रहें प्रसून ||

भ्रष्ट प्रशासन से हुई, भारत माँ कमजोर|
संसाधन, प्रतिभा गई, कैसे होगी भोर ||

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा

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