शीर्षक: स्वप्न-दीप!
मिट्टी के अक्षय स्वप्न-दीप से.
दीप-मालाएं जगमगानी चाहिए,
गर्म राख में उठी चिंगारी से,
क्रांति की मशाल जलनी चाहिए |१||
उम्मीदों की कुंकुम-देहरी पर,
सहस्त्र स्वस्तिक उभरने चाहिए ...
आँगन के तुलसी वृंदावन में,
नित सपनों का दीप जलाना चाहिए ||२||
घर-आँगन में सजी अल्पना से,
कल्पना का इन्द्रधनुष उभरना चाहिए!
आँगन में खड़े पारिजात पर,
श्वेत-केशरी पुष्प खिलने चाहिए! ||३||
बून्द-बून्द से सिंचित धरा पर ,
स्वेद-बूंदों की अमृत-वर्षा चाहिए!
रत्नगर्भा धरती की कोख से,
हजारों अंकुर प्रस्फुटित होने चाहिए |४||
खुंट से उपेक्षित वृक्ष पर भी,
कोमल कोपलें मुस्कुरानी चाहिए ….
किनारे पर बिखरी भीगी रेत से,
सपनों के महल बनने चाहिए ||५||
सागर में उछलती लहरों पर,
स्वप्न-नौकाएं डोलनी चाहिए!
सतरंगी इन्द्रधनु की सीढ़ी बना,
अंतरिक्ष के रहस्य ढूंढना चाहिए ||६||
रुपहले बादलों की ठुठ्ठी पर,
नजरबट्टू काला तिल होना चाहिए,
जिंदगी की दुरिह मैराथन में,
जीत-वरमाला के लिए जीवट चाहिए ||७||
महत्वाकांक्षाओं का लावा,
ज्वालामुखी सा सीने में उबलना चाहिए!
पत्थरों के बीच से मुस्कुराता,
टुकुर-टुकुर निहारता 'कुसुम' चाहिए ||८||
स्वप्न-पूर्ति-रश्मियां बिखेरता रवि,
अम्बर में नित उदित होना चाहिए,
अग्निपंख लगे परिंदों की,
एवरेस्ट चोटियों पर नज़र चाहिए ||९||
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र