बिनब्याही माँ भाग 2 जैसे-जैसे कॉलेज का विशाल भवन नजदीक आ रहा था, रश्मि दरवाजे से बार-बार झाँकते बच्चे सी यहाँ-वहाँ देख रही थी.. तभी जोर-जोर से एक लाल रंग की बाइक का हॉर्न सुनाई देने लगा...उसने गुस्से से पीछे मूड कर देखा," कौन है बेवकूफ.. सारा रास्ता खाली पड़ा है और यह हॉर्न पर हॉर्न दिए जा रहा है..." गुस्से से भरी नज़रे बाइक सवार से मिलते ही उफ़नता दूध ठन्डे पानी की बुँदे पड़ते ही मानों शांत हो गया था .. वह सकपका गई... पता ही नहीं चला उसे कब वह सड़क के मध्य में आकर चलने लगी थी! जैसे ही उस छैल-छबिले से रश्मि की आँखें चार हो गई... उसकी सखी के मुख पर स्मित हास्य उभर आया और रश्मि नज़रे चुराते हुए आगे बढ़ने लगी...
बाइक गुजर गई और फ़िजा में गुंजते रहे गीतों के बोल... " मार डाला.. अल्लाह! मार डाला "
उसने नज़रे झुका दी थी... चेहरे पर झूठ-मुठ का क्षोभ दिखा रही थी वो जेसीका के सामने मगर मन में तो खुशियों के लड्डू फूट रहे थे... यह तो स्वाभाविक ही था यौवन से प्रफुल्लित शोडषि के श्रुँगार पर रौबिले पौरुष की टिप्पणी न आएं तो उस श्रुँगार का मतलब ही क्या...? 

कुछ पल तेज हुई धड़कने अब स्थिर हो चुकी थी! सांसों के जलतरंग पर मानों कोमल उंगलियों का जादू चल चूका था और वह उस रूहानी फ़िजा में खुद को समाहित कर चुकी थी...
जेसीका उसे 'बाय-बाय' कह कर अपनी कक्षा में प्रवेश कर चूकी थी और रश्मि अनभिज्ञ सी आगे बढ़ रही थी!
आज सिर्फ दो पीरियड ही थे फिर मातारानी की पूजा- अर्चना! 
कक्षा के ज्यादातर छात्र झब्बा-कुर्ता पहन कर आएं थे! किसी ने लखनवी तो किसी ने सिल्क का कुर्ता पहना था.. किसी के कुर्ते पर इंद्रधनुष के रंग बिखरे थे तो कोई लाल- पीला पहन त्यौहार के आनन्द का शंखनाद कर रहा था!
कितने नखरे होते हैं न स्त्रियों के...कितनी डिज़ाइनस, कितने फैब्रिक्स... कितने अलंकार... 
क्या सादगी में रूप नहीं खिलता? चेहरे पर एक नटखट, मासूम मुस्कान, व्यायाम और समतोल आहार से गठित आकर्षक शरीर और साथ में सरल, सहज़ स्फटिक सा निर्मल मन...
रश्मि मन ही मन मुस्कुराने लगी... सब ऐसे ही सोचेंगे तो कहाँ जाएंगे बेचारे ज्वेलरी के बड़े-बड़े शो रूम वाले, नकली एक ग्राम सोने की परत चढ़े, चाँदी के गहने छोटी छोटी दुकानों में बेचने वाले? फैशन उद्योग का तो बट्टा ही बैठ जायेगा जी!
वह खुद से ही बातें कर रही थी तभी प्रोफेसर महाशय को अवतरित होते देख वह संभल गई! कब्बडी की जानी- मानी खिलाडी होने के साथ ही वह एक मेधावी छात्रा भी थी! जहॉं-जहाँ भी उसने शिक्षा ग्रहण की थी, उसने उस संस्थान को समाज में गर्व करने के कई मौके भी दिए थे! सभी उसे खूब मान-सम्मान भी देते थे...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
शेष अगले भाग में....


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