सरसी छन्द...

सदा आगमन नूतन संवत, लाता है आनन्द।
गुड़ी पाड़वा उत्सव करता, जगत चाक़-चौबन्द।।
अनुपम स्वरुप सृष्टि का देखो, भाएं जीव अपार।
मन में 'मोहन वीणा' बजती, रचती सरसी छन्द।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं